458 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. संघ में सभी के खुले प्रवेश के आलोचक
- किसी भी अनुयायी या उपासक गृहस्थ को भिक्षु-संघ खुला प्रवेश देकर अपना
सदस्य बना सकता था।
- कुछ ऐसे लोग थे, जो भिक्षु-संघ को किसी के भी प्रवेश करने के लिये एक
विशाल खुला मन्दिर बना देने के लिये तथागत की आलोचना करते थे। 3. वे तर्क देते थे कि ऐसी व्यवस्था के अधीन ऐसा हो सकता है कि संघ में प्रवेश
कर जाने के उपरान्त भिक्षु इसे छोड़ दें, और पुनः अपनी निम्न अवस्था में लौट
जायें और उनके वापिस चले जाने से लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि
श्रमण गौतम का यह धम्म अवश्य ही निरर्थक है, तभी तो लोगों ने छोड़ दिया
है।
- यह आलोचना निराधार थी, जिस उद्देश्य से इस व्यवस्था को बनाने में तथागत
का ध्यान था, वह उद्देश्य आलोचकों के ध्यान में आया ही नहीं था। 5. तथागत ने उत्तर दिया कि अपने धम्म की स्थापना में उन्होंने एक ऐसे अमृत
भरे सरोवर का निर्माण किया, जिसमें सद्धर्म का स्नान मुक्ति के श्रेष्ठ जलों से
परिपूर्ण है।
- यह तथागत की इच्छा भी थी कि कोई भी मलिन चित्त वाला दूषित प्राणी इस
सद्धम्म रूपी सरोवर में स्नान करके अपने सभी पापों को धो सकता है। 7. और यदि कोई, सद्धम्म के सरोवर तक जाकर, उसमें स्नान नहीं करता, बल्कि
पहले की तरह दूषित रहते हुए ही लौट आता है और पुनः निम्न अवस्था में
वापस आ जाता है, तो यह उसी को दोष दिया जा सकता है न कि धम्म
को।
- तथागत ने कहा, ‘‘या, क्या मैं लोगों को अपने पापों को धोने के लिये समर्थ
बनाने के लिये इस सरोवर का निर्माण करने के पश्चात् कहूँ ‘जो दूषित हैं,
वे इस सरोवर में स्नान करने न जायें! केवल वही इस सरोवर में स्नान करने
जायें जिनकी दुष्चेतनाओं की धूल-गर्द धुली हुई है, जो पवित्र और निर्मल चित्त
हों।’’
‘‘ऐसी शर्तों पर मेरे धम्म का क्या उपयोग होगा?’’
आलोचक यह भूल गये कि तथागत अपना धम्म कुछ ही लोगों तक सीमित
रखना नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि उसका द्वार सभी के लिये खुला रहे,
सभी इसका परीक्षण कर सकें।