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2. व्रत-गहण करने के आलोचक
- पंचशील ही पर्याप्त नहीं है? व्रतों की आवश्यकता का अनुभव क्यों किया गया?
ये ऐसे प्रश्न थे, जो प्रायः उठाये जाते थे।
- यह तर्क दिया जाता था कि यदि रोगों का निवारण दवा के बिना हो सकता है,
तो वमनकारी औषधियों द्वारा, जुलाब की औषधियों द्वारा इसी प्रकार की अन्य
औषधियों द्वारा शरीर को रोग रहित बनाने का क्या लाभ है? 3. ठीक इसी प्रकार, यदि गृहस्थ लोग, घर में रहते हुए और इन्द्रियों के सुख
का आनन्द लेते हुए पंचशील ग्रहण करके स्वयं में शान्ति, सर्वश्रेष्ठ हितकारी
निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं, तो भिक्खु को इन व्रतों को धारण करने की क्या
आवश्यकता है?
- तथागत ने इसमें अन्तर्निहित सद्गुणों के कारण व्रतों का आविष्कार किया था।
- व्रतों द्वारा प्रतिबन्धित जीवन के नैतिक पथ पर अग्रसर होना निश्चित है, यह
स्वयं में ही पतन के विरुद्ध एक संरक्षण है।
- जो व्रत धारण करते हैं और उनका स्वतन्त्र रूप से पालन करते हैं वे ही विमुक्त
हैं।
- व्रतों का पालन करने से काम-तृष्णा, ईर्ष्या और अहंकार तथा बुरे विचारों का
उच्छेदन होता है।
- जो व्रत ग्रहण करते हैं और उनका पालन करते हैं। वे निस्सन्देह भली-भांति
संरक्षित रहते हैं और वे मन तथा कर्म से पूर्णतया निर्मल होते हैं। 9. मात्र शील ग्रहण करने से ऐसा नहीं होता।
- शील ग्रहण करने के मामले में नैतिक-पतन के विरुद्ध कोई बचाव नहीं है,
जैसा कि व्रत ग्रहण करने के मामले में है।
- व्रतों का जीवन अत्यन्त कठिन है और शील ग्रहण करने वालों का जीवन उतना
कठिन नहीं। मानवता के लिये कुछ ऐसे लोगों का होना आवश्यक है, जो व्रतों
का जीवन व्यतीत करें। अतः तथागत ने दोनों को निर्धारित किया था।
3. अहिंसा-सिद्धान्त की आलोचना
- ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अहिंसा के सिद्धान्त का विरोध किया था। वे कहते थे
कि ‘अहिंसा’ का तात्पर्य अत्याचार और अन्याय के सामने सिर झुकाना था।