6. प्रसेनजित् के द्वारा तथागत की प्रशंसा में - Page 508

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  1. उस अवसर पर अनेक भिक्षु खुली हवा में चहल कदमी कर रहे थे। तब कोशल

का राजा प्रसेनजित् उन भिक्षुओं के पास गया और इस प्रकार उनको सम्बोधित

किया, ‘‘भन्ते! इस समय तथागत कहाँ विराजमान हैं, क्योंकि मैं सम्यक सम्बुद्ध

के दर्शन करना चाहता हूँ।’’

  1. ‘‘महाराज! वहाँ वे ठहरे हैं और द्वार बन्द है। बिना घबराहट के आप शान्ति

से वहाँ जायें, बरामदे में प्रवेश कर खाँसें और दरवाजे की कुण्डी खटखटायें।

तथागत आपके लिये द्वारा खोल देंगे।’’

  1. तब कोशल का राजा प्रसेनजित् जैसा उन्हें कहा गया था आवास तक उसी

प्रकार गये, खाँसे और दरवाजे की कुण्डी खटखटायी और तथागत ने दरवाजा

खोल दिया।

  1. तब प्रसेनजित् ने आवास में प्रवेश किया, तथागत के चरणों में अपना शीश

नवाया, उनके चरणों को चूमा और उन्हें अपने हाथों से स्पर्श किया और अपना

नाम बताते हुए यह कहा, ‘‘भगवान! मैं प्रसेनजित् हूँ। कोशल का राजा।’’

  1. तथागत ने पूछा, ‘‘किन्तु, महाराज! इस शरीर में ऐसी क्या विशेषता देखकर,

आप मेरे प्रति इतना भक्ति-भाव दिखा रहे हैं और इस शरीर को ऐसी स्नेहमय

श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं?’’