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1. उनके धम्म-प्रचार के केन्द्र
- ऐसा नहीं था कि धम्म-प्रचारकों की नियुक्ति के पश्चात् तथागत एक जगह
पर बैठ गये। वे स्वयं भी अपने धर्म-प्रचारक के रूप में कार्य करते रहे थे। 2. ऐसा प्रतीत होता है कि तथागत ने कुछ विशेष स्थलों को धम्म के प्रचार के
लिए प्रमुख केन्द्र बनाया था।
ऐसे केन्द्रों में प्रधान थे श्रावस्ती और राजगृह।
वे लगभग 75 बार श्रावस्ती पहुंचे थे और लगभग 24 बार राजगृह।
कुछ दूसरे छोटे केन्द्र भी धर्म-प्रचार के लिए बनाये गये थे।
वे थे कपिलवस्तु, जहां वे 6 बार पहुंचे, वैशाली जहां वे 6 बार पहुंचे और
कम्मास धम्म 4 बार।
2. वे स्थल, जहाँ भगवान् बुद्ध पधारे थे
- इन प्रमुख और छोटे केन्द्रों के अतिरिक्त तथागत अपनी धर्म-प्रचार-यात्रा के
दौरान अनेक दूसरे स्थलों पर भी पहुचे थे।
- वे उक्कठा, नादिका, साला, अस्सपुर, घोषिताराम, नालन्दा, आपण एवं एतुमा
पधारे थे।
- वे ओपसाद, इच्छा-नंगल चाण्डाल कुप्प, कुसीनारा भी गए थे।
- वे देवदह, पावा, अम्बसंदा, सेतव्या, अनुपिय और उगुन्मा भी आये थे।
- उन स्थलों के नाम जहां वे पहुंचे थे दर्शाते हैं कि वह शाक्य-जनपद, कुरु-जनपद
और अंग जनपद भी पधारे थे।
- मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने सम्पूर्ण उत्तर भारत की यात्रा की थी।
- ये केवल कुछ ही स्थल प्रतीत होते हैं, किन्तु उनके बीच की दूरी कितनी
है? राजगृह लुम्बिनी से 250 मील से कम दूर नहीं है। यह केवल दूरियों का
अनुमान मात्र है।
- ये दूरियां तथागत ने पैदल ही तय की थीं। यहाँ तक कि उन्होंने बैलगाड़ी तक
का भी उपयोग नहीं किया।
- अपनी चारिकाओं के दौरान रास्ते में रुकने के लिए उनके पास कोई जगह
नहीं थी। आगे चलकर उनके गृहस्थ उपासकों ने विहारों और विश्राम-स्थलों