2. स्थल, जहाँ वे पधारे थे - Page 513

484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

का निर्माण करवा दिया था जिन्हें वे और उनके भिक्षु अपनी यात्राओं के समय

पड़ाव के रूप में प्रयोग करते थे। प्रायः वे सड़क के किनारे के पेड़ों की छाया

के नीचे ही रुका करते थे।

  1. जिनके मन में सन्देह थे, उनके संदेह मिटाते हुए, जो विरोधी थे, उनके तर्कों

का उत्तर देते हुए, जो बच्चों की तरह उनका विश्वास करते थे, उन्हें सच्चा

मार्ग दिखाते हुए, तथागत एक जगह से दूसरी जगह, एक गांव से दूसरे गांव

विचरते थे।

  1. तथागत जानते थे कि वे जो उन्हें सुनने के लिए उनके पास आते थे उनमें सभी

समान रूप से बुद्धिमान नहीं थे, और न ही सभी खुले दिमाग और मुक्त चित्त

के होते थे।

  1. यहां तक कि उन्होंने भिक्षुओं को आगाह कर दिया था कि श्रोतागण तीन प्रकार

के होते हैं।

  1. ‘‘खाली दिमाग जिस मूर्ख को कुछ भी, कुछ भी दिखाई देता, यद्यपि वह

भिक्षुओं के पास बार-बार जाता है, वह उनकी बातें प्रारम्भ, मध्य और अंत में

भी सुनता है किन्तु कुछ समझ नहीं सकता। उसमें बुद्धि ही नहीं होती।’’

  1. ‘‘लेकिन उससे अच्छा वह आदमी होता है, जो प्रायः भिक्षुओं के पास जाता है,

उनकी सारी बातें सुनता है, प्रारम्भ, मध्य और अन्त में भी वहां बैठे हुए सारी

बातों को सुनता है, लेकिन वहां से उठने पर, कुछ भी याद नहीं रख पाता,

उसका चित्त कोरा हो जाता है।’’

  1. ‘‘इनमें अच्छा प्रशस्त-प्रज्ञ मनुष्य है। वह प्रायः भिक्षुओं के पास जाता है उनकी

सारी बातें सुनता है, प्रारम्भ, मध्य और अन्त में भी वहां बैठे हुए सारी बातों

को ग्रहण कर सकता है, सब कुछ चित्त में धारण करता है, स्थिर-चित्त,

एकाग्र-चित्त तथा धर्म व धार्मिक विषयों में दक्ष होता है।’’

  1. यह सब होते हुए भी तथागत एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर अपने धर्म का

प्रचार करने में कभी नहीं थके।

  1. एक ‘भिक्षु’ के समान तथागत ने कभी भी तीन वस्त्रों से अधिक कभी नहीं

रखे। वे एक दिन में एक बार भोजन करते थे और अपना भोजन प्रत्येक सुबह

एक घर से दूसरे घर भिक्षा मांगकर प्राप्त करते थे।

  1. सम्भवतः किसी भी मनुष्य ने इससे कड़े ‘कर्त्तव्य’’ को निभाया होगा, जिसे

उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से निभाया था।