5. बुद्ध और सारिपुत्त की अंतिम भेंट - Page 517

488 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. सारिपुत्र अपने गाँव में पहुंचकर अपने घर की ठीक उसी कोठरी में निर्वाण को

प्राप्त हुए, जिसमें उनका जन्म हुआ था।

  1. सारिपुत्र का अंतिम संस्कार किया गया और उनकी पवित्र अस्थियाँ तथागत के

पास ले जायी गयीं।

  1. सारिपुत्र के फूल प्राप्त करने पर तथागत ने भिक्षुओं से कहा, ‘‘वह सबसे

अधिक बुद्धिमान थे, उनमें बिल्कुल संग्रह-वृत्ति नहीं थी, वे उत्साही और

परिश्रमी थे, वे पाप से घृणा करते थे। हे भिक्षुओ! उनकी अस्थियाँ देखो! वह

अपनी क्षमाशीलता मेंं इतने दृढ़ थे कि जितनी कि पृथ्वी। वे कभी भी किसी

भी इच्छा द्वारा नियंत्रित नहीं हुए, उन्होंने अपने सभी मनोविकारों को जीत लिया

था, वे करुणा, मैत्री और प्रेम से परिपूर्ण थे।’’

  1. उसी समय के आस-पास महामोद्गल्यायन तब राजगृह के पास एकान्त विहार

में रह रहे थे। तथागत के शत्रुओं द्वारा नियुक्त कुछ हत्यारों ने उसकी हत्या कर

डाली थी।

  1. उनकी मृत्यु का दुःखद समाचार भी तथागत तक पहुँचा दिया गया था। सारिपुत्र

और महामोद्गल्यायन उनके दो प्रमुख शिष्य थे। वे धम्म सेनापति कहलाते थे।

तथागत अपने धम्म के प्रचार को चालू रखने के लिये उन पर निर्भर करते

थे।

  1. उन दोनों की मृत्यु से तथागत के मन में संवेग उत्पन्न हुआ।

  2. अब वे श्रावस्ती में और ठहरना नहीं चाहते थे और अपने चित्त को शांत करने

के लिये उन्होंने आगे बढ़ जाने का निर्णय लिया था और तथागत ने श्रावस्ती

छोड़ दी।