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5. भगवान् बुद्ध और सारिपुत्त की अंतिम भेंट
भगवान बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन में गन्धकुटी विहार में ठहरे हुए थे।
सारिपुत्र पांच सौ भिक्षुओं के साथ वहां पहुंचे।
तथागत का अभिवादन करने के पश्चात् सारिपुत्र ने उन्हें कहा कि पृथ्वी पर
अब मेरे जीवन का अंतिम समय आ गया है। क्या तथागत मुझे अपने शरीर
का त्याग करने की अनुमति देंगे?
- भगवान बुद्ध ने सरिपुत्र से पूछा, ‘‘क्या तूने अपने निर्वाण के लिये कोई स्थान
चुना है?’’
- सारिपुत्र ने तथागत को बताया, ‘‘मैं मगध के नालक नाम के गांव में पैदा हुआ
था। वह घर जिसमें मैं पैदा हुआ था, वह अभी तक खड़ा है। मैंने अपना घर
अपने निर्वाण के लिये चुना है।’’
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘प्रिय, सरिपुत्र! तुम्हें जैसा अच्छा लगे वैसा करो।’’
- सारिपुत्र तथागत के चरणों में गिर पड़े और कहा, ‘‘मैंने एक हजार कल्पों तक
पारमिताओं का अभ्यास केवल एक ही इच्छा को लेकर किया और वह है,
आपके चरणों की वन्दना करने का सम्मान। मेरी वह इच्छा समाप्त हो गयी है
और मेरी प्रसन्नता का कोई अंत नहीं।’’
- ‘‘हमारी पुनरुत्पत्ति की संभावना नहीं है, इसलिये यह हमारी अंतिम भेंट है।
तथागत मेरे अपराधों को क्षमा करें। मेरा अंतिम दिन आ गया है।’’ 9. ‘‘सारिपुत्र! क्षमा करने के लिये कुछ भी नहीं है,’’ तथागत ने कहा। 10. जब सारिपुत्र जाने के लिये उठे, तथागत भी उनके प्रति गौरव प्रकट करने के
लिए उठ खड़े हुए और गन्धकुटी के बाहर बरामदे में खड़े हो गये। 11. तब सारिपुत्र ने तथागत से कहा, ‘‘मैं प्रसन्न था, जब मुझे पहली बार आपके
दर्शन हुए थे। मैं आपको अभी देखकर अत्यन्त आनन्दित हूँ। मैं जानता हूँ कि
मैं यह आपका अंतिम दर्शन कर रहा हूँ। मुझे पुनः आपके दर्शन प्राप्त नहीं
होंगे।’’
- अपने हाथ जोड़कर तथागत को बिना अपनी पीठ दिखलाये, वह वहाँ से विदा
हुए।
- तब तथागत ने उपस्थित भिक्षुओं को कहा, ‘‘अपने ज्येष्ठ भ्राता का अनुसरण
करो और पहली बार भिक्षु-संघ तथागत को छोड़कर सारिपुत्त के पीछे-पीछे
गया।’’