490 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. वैशाली से विदाई
- अपनी अंतिम चारिका पर निकलने से पूर्व तथागत राजगृह के गृध्रकूट पर्वत पर
ठहरे हुए थे।
- वहां कुछ समय ठहरने के पश्चात् उन्होंने कहा ‘‘आओ आनन्द! हम लोग
अम्ब-लट्ठिका चलें।’’
- ‘‘ऐसा ही हो भगवन्!’’ आनन्द ने स्वीकृति में कहा और तथागत एक विशाल
भिक्षु-संघ सहित, अम्बलठिका की ओर चल दिए।
- कुछ समय अम्बलठिका में ठहरने के पश्चात् वे नालन्दा की ओर चले गये।
- नालन्दा से वे मगध की राजधानी पाटलिगाम (पाटलीपुत्र) गये।
- पाटलीगाम से वे कोटिगाम गये और कोटिगाम से वे नादिका गये।
- इनमें से प्रत्येक स्थान पर वे कुछ दिनों के लिये रुके और भिक्षुओं या गृहस्थों
को धार्मिक प्रवचन दिया।
नादिका से वे वैशाली गये।
वैशाली निगण्ठनाथ पुत्र (महावीर) की जन्म-स्थली थी, अतः वह जैन मत का
एक गढ़ थी।
- किन्तु तथागत शीघ्र ही वैशाली के लोगों को अपने धम्म में धर्मान्तरित करने
में सफल हो गये।
- ऐसा कहा जाता है कि अनावृष्टि के कारण वैशाली में ऐसा अकाल पड़ा कि
बड़े पैमाने पर उजड़ गया और लोग बड़ी संख्या में मर गये। 12. वैशाली के लोगों ने अपनी आयोजित सामान्य सभा में इसकी चर्चा की थी। 13. सभा ने पर्याप्त चर्चा के पश्चात् तथागत को नगर में आमंत्रित करने का निर्णय
लिया।
- राजा बिम्बिसर के मित्र वैशाली के पुरोहित के पुत्र महाली नामक लिच्छवी को
निमंत्रण देने के लिये भेजा गया।
- तथागत ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया था और पांच सौ भिक्षुओं के साथ चल
दिये। ज्यों ही वे वैशाली की सीमा में प्रविष्ट हुए, बड़े जोर से तूफान आया,
मूसलाधार वर्षा हुई और अकाल समाप्त हो गया।
- वैशाली के लोगों ने तथागत का भारी स्वागत किया।