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  1. तथागत ने वैशाली के लोगों का हृदय जीत लेने के उपरांत यह स्वाभाविक था

कि वैशाली के लोग उनका गर्म-जोशी से स्वागत करते।

  1. तब वर्षावास का समय आ गया। तथागत अपने वर्षावास के लिये वेलुवन चले

गये और भिक्षुओं से अपना वर्षावास वैशाली में ही करने को कहा। 19. अपना वर्षावास समाप्त करने के पश्चात् तथागत यह विचार कर वैशाली आये

कि वैशाली से अपनी चारिका पर वे आगे बढ़ेंगे।

  1. अतः यथागत ने एक दिन सुबह स्वयं चीवर धारण कर अपना भिक्षा-पात्र ले

भिक्षाटन के लिये वैशाली में प्रवेश किया, जब उन्होंने वैशाली से भिक्षा प्राप्त

कर और अपना भोजन ग्रहण कर लेने के बाद उन्होंने एक गजराज के समान

वैशाली की ओर देखा और भदन्त आनन्द को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘आनन्द!

यह अंतिम बार है कि तथागत वैशाली को देख रहे हैं।’’

  1. इस प्रकार कहते हुए उन्होंने वैशाली के लोगों से विदा ली।
  2. जिस समय उन्होंने उत्तरी सीमा पर प्राचीन नगर तक आकर विदाई दी, तो

लिच्छवियों को ‘स्मृति-चिन्ह’ के रूप में अपना भिक्षा-पात्र दे दिया। 23. यह वैशाली की उनकी अंतिम यात्रा थी। इसके बाद वे पुनः आने के लिए

जीवित नहीं रहे।

2. पावा में पड़ाव

  1. वैशाली से तथागत भण्डगाम गये।

  2. भण्डगाम से वे हत्थिगाम हट्ठी नगर गये और तब भोग-नगर गये।

  3. और भोग-नगर से पावा गये।

  4. पावा में तथागत चुन्द नामक एक सुनार के आम्रवन में ठहरे।

  5. अब चुन्द ने सुना कि तथागत पावा आ चुके हैं और उसके आम्रवन में ठहरे

हुए हैं।

  1. चुन्द आम वन गया और तथागत के समीप बैठ गया, जहाँ उन्होंने उसे एक

धार्मिक प्रवचन दिया।

  1. इससे प्रसन्न होकर चुन्द ने तथागत को संबोधित किया और कहा ‘‘तथागत!

भिक्षु-संघ सहित कल मेरे घर में भोजन ग्रहण करने की कृपा करें।’’ 8. तथागत ने मौन द्वारा अपनी स्वीकृति दे दी। यह देखकर कि तथागत ने स्वीकृति

दे दी है, चुन्द वहाँ से विदा हुआ।