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1. उत्तराधिकारी की नियुक्ति
- एक समय तथागत शाक्यों के मध्य धनुर्धारी नामक शाक्य परिवार के आम्रवन
में ठहरे हुए थे।
- उस समय पावा में अभी-अभी गिगठनातपुत्र (महावीर) का देहांत हुआ ही था।
उनकी मृत्यु पर निगण्ठ लोग आपसी संघर्ष और विवाद के कारण अलग हो
गये और दो दलों में विभक्त होकर शब्द रूपी बाणों से एक दूसरे से झगड़ने
और हानि पहुंचाने लगे।
- उस समय श्रामणेर चुन्द पावा में वर्षावास व्यतीत करने के उपरान्त भदन्त आनन्द
को देखने आया और कहा, ‘‘भन्ते! निगण्ठनातपुत्र का अभी-अभी देहान्त हुआ
है। और उनकी मृत्यु हो जाने पर निगण्ठ लोग अलग-अलग हो गये हैं तथा
एक-दूसरे से झगड़ा कर हानि पहुंचा रहे हैं। यह इसलिये है, क्योंकि वे अब
बिना संरक्षक के हैं।’’
- तब भदन्त आनन्द ने कहा, ‘‘मित्र चुन्द! यह तथागत के समक्ष रखने लायक
योग्य विषय है। आओ हम उनके पास चलें और उन्हें इसके विषय में सूचित
करें।’’
‘‘बहुत अच्छा, भन्ते!’’ चुन्द ने उत्तर दिया।
अतः भदन्त आनन्द और श्रामणेर चुन्द तथागत के पास गये और उन्हें अभिवादन
करके उन्हें निगण्ठों के विषयों में बताया और उन्होंने अपने धम्म शासन के
लिए एक संरक्षक नियुक्त करने की आवश्यकता के लिये निवेदन किया।
- तथागत ने यह सुन कर उत्तर दिया ‘‘किन्तु चुन्द! विचार करो, जहाँ एक शास्ता
अर्हत, सम्यक् संबुद्ध संसार में उत्पन्न होता है, यदि वह सद्धर्म को भलि-भांति
स्थापित करता है, जो सु-आख्यात, प्रभावशाली पथ-प्रदर्शन है और शांति की
ओर ले जाता है, किन्तु उसके शिष्य सद्धर्म में प्रवीण नहीं हो पाये हैं और
न उनके लिये शिष्टाचार बचाने वाली एक वस्तु बन सका है, मनुष्यों के मध्य
भली-भाँति उद्घोषित नहीं है, जब उनका शास्ता गुजरता है।’’
- ‘‘तो चुन्द! ऐसे शास्ता की मृत्यु होना उसके श्रावकों के लिये बड़े दुःख की
बात है और उसके धम्म के लिये एक बड़ा खतरा है।’’
- ‘‘किन्तु चुन्द! विचार करो जहां एक ऐसा शास्ता पूर्णतया प्रबुद्ध संसार में उत्पन्न
हुआ है सद्धर्म को भलि-भांति स्थापित करता है जो सु-आख्यात प्रभावशाली
पथ-प्रदर्शक और शांति की ओर ले जाने वाले हैं, तथा जहाँ श्रावण सद्धर्म में