496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
प्रवीण हो गये हैं, और जहां श्रेष्ठ जीवन का पूर्ण विस्तार उन्हें स्पष्ट हो चुका
है जब वह शास्ता गुजरता है।’’
- ‘‘तो चुन्द! ऐसे शास्ता की मृत्यु होना उसके श्रावकों के लिये दुःख की बात
नहीं है। तब एक संरक्षक की क्या आवश्यकता है?’’
- जब आनन्द ने यही बात किसी दूसरे अवसर पर उठाई तो तथागत ने कहा
‘‘तुम क्या सोचते हो, आनन्द? क्या तुम्हें दो भिक्षु भी दिखाई देते हैं, जिनका
धम्म में एक मत न हो?’’
- ‘‘नहीं! किन्तु जो तथागत के आस-पास हैं, हो सकता है, वे तथागत की मृत्यु
के पश्चात् संघ में विनय संबंधी नियमों के पालन को लेकर विवाद खड़ा कर
सकते है और ऐसे विवाद सामान्य दुख का कारण बन सकते हैं?’’ 13. ‘‘आनन्द! ‘विनय’ संबंधी विवाद बहुत महत्त्व देने के नहीं हैं। यह संभव हो
सकता है कि संघ में ‘धम्म’ के भी विवाद खड़े हों, जिनका वास्तव में महत्त्व
है, जो सचमुच चिंता की बात होगी।’’ तथागत ने कहा।
- ‘‘लेकिन ‘धम्म’ के विषय में ये विवाद किसी एक तानाशाह (डिक्टेटर) द्वारा
नहीं सुलझाये जा सकते हैं। और तब एक उत्तराधिकारी ही क्या कर सकेगा,
जब तक कि वह एक तानाशाह (डिक्टेटर) की तरह व्यवहार नहीं करे।’’ 15. ‘‘ ‘धम्म’ के विषय में मतभेद एक तानाशाह (डिक्टेटर) द्वारा नहीं सुलझाये
जा सकते हैं।’’
- ‘‘किसी भी विवाद के विषय में निर्णय संघ द्वारा ही निकाला जाना चाहिये।
संपूर्ण भिक्षु-संघ को एकत्रित होना चाहिये और विषय पर विचार करना चाहिये
जब तक कि सहमति न हो और तब उसे ऐसी सहमति के अनुरूप सुलझाना
चाहिये।
- ‘‘विवादों को सुलझाने का तरीका बहुमत की सहमति हैं, न कि एक उत्तराधिकारी
की नियुक्ति है।’’
2. अंतिम धम्म-दीक्षा
- उस समय सुभद्र परिव्राजक कुसीनारा में ठहरा हुआ था। और सुभद्र परिव्राजक
ने यह उड़ती-उड़ती बात सुनी, ‘‘यह कहा जाता है कि आज ही के दिन रात्रि
के अंतिम प्रहर में श्रमण गोतम का महापरिनिर्वाण होगा।’’ तब सुभद्र परिव्राजक
के मन में यह विचार आया।