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1. उनका व्यक्तिगत स्वरूप

  1. जितने भी वर्णन मिलते हैं, उनसे ज्ञात होता है तथागत एक अत्यन्त ही सुन्दर

शरीर वाले व्यक्ति थे।

  1. उनका स्वरूप एक स्वर्णिम-पर्वत के शिखर के समान था। वे लम्बे और सुडौल।

उनका आकार-प्रकार आकर्षक था।

  1. उनकी लम्बी-लम्बी बाहें और सिंह की सी चाल, उनकी वृषभ की सी आंखें,

स्वर्ण समान दीप्ति, उनकी सुन्दरता, उनका चौड़ा सीना-सभी को अपनी ओर

आकर्षित करते थे।

  1. उनकी भौंहें, उनका माथा, उनका चेहरा या उनकी आंखें, उनका शरीर, उनके

हाथ, उनके पांव एवं उनकी चाल, जिस किसी अंग पर किसी की भी नजर

पड़ी, उसकी आंखें उसी की ओर आकृष्ट होकर रह गयीं।

  1. जिस किसी ने भी उनको देखा वह, सभी दूसरे मनुष्यों से श्रेष्ठ उनकी

तेजस्विता और उनकी सामर्थ्य, उनके अनुपम सौंन्दर्य से प्रभावित हुए बिना न

रह सका।

  1. उनको देख लेने पर जहाँ जो कहीं ओर जा रहा होता, शान्त खड़ा रहता, वह

उनका अनुसरण करने लगता था। वह जो सौम्यता व गम्भीरता से चल रहे होते,

तो लोग तेजी से दौड़ने लगते थे, और जो कोई बैठा होता वह तुरन्त खड़ा हो

जाता था।

  1. जो भी उनसे भेंट करते थे, उनमें से कुछ उन्हें हाथ जोड़कर अभिवादन करते

थे, कुछ दूसरे श्रद्धा से शीश नवाकर नमन करते थे, कुछ उन्हें स्नेहमय शब्दों

से संबोधित करते थे, उनमें से कोई भी उन्हें आदर प्रकट किये बिना नहीं रहता

था।

  1. वे सभी के प्रिय पात्र और आदरणीय थे।

  2. पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियां भी सदैव उन्हें सुनने के लिये तत्पर रहती थीं।

  3. उनकी वाणी असाधरण रूप से मधुर तथा ढोल के समान गम्भीर, प्रीतिकर,

गुंजायमान और भावपूर्ण थी। इससे उनकी वाणी दिव्य संगीत जैसी हो गयी

थी।

  1. उनकी वही वाणी श्रोताओं को कायल कर देती थी और उनके दर्शन श्रद्धायुक्त

विस्मय को प्रेरित करते थे।

  1. उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वे न केवल लोगों के स्वाभाविक नेता बनने

के लिये उपयुक्त थे, बल्कि उन्हें उनके अनुयायियों के दिलों का देवता भी

बनाता था।