2. प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्य - Page 541

512 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. जब वे बोलते थे सदैव उन्हें श्रोता मिल जाते थे।

  2. इसका उतना महत्त्व नहीं था कि वे क्या कहते थे। वे भावनाओं को प्रभावित

करते थे तथा जो कोई भी उन्हें सुन रहा होता था, उन्हें अपनी इच्छानुसार मोड़

लेते थे।

  1. अपने श्रोताओं के चित्त में वे यह बात उत्पन्न कर सकते थे कि, जो कुछ

उन्होंने दिया है, वह न केवल सत्य है, बल्कि उनकी मुक्ति का एकमात्र मार्ग

भी है।

  1. उनके श्रोता उनके वचनों में उस सत्य के दर्शन कर सकते थे, जो दासों को

स्वतन्त्र मनुष्यों में परिवर्त्तित कर सकता था।

  1. जब भी वे स्त्री व पुरुषों से वार्तालाप करते थे, उनका शांत स्वरूप उन्हें

श्रद्धायुक्त विस्मय और आदर भावना से प्रेरित करता था और उनकी मधुर वाणी

उन्हें हर्षोन्माद व आश्चर्य से प्रभावित कर देती थी।

  1. डाकू अंगुलिमाल या अटावि व आदमखोर को कौन धम्म में दीक्षित कर सकता

था? एक शब्द द्वारा कौन राजा प्रसेनजित् तथा उनकी रानी मल्लिका का

मेल-मिलाप करा सकता था? उनके सम्मोहन के अधीन आ जाने वाला सदैव

के लिये उनका हो जाता था। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक था।

2. प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्य

  1. यह परम्परागत दृष्टिकोण उन प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्यों द्वारा समर्थित होता हैं,

जिन्होंने भगवान् बुद्ध को देखा था और उनसे भेंट की थी, जब वे जीवित

थे।

  1. ऐसा एक प्रत्यक्षदर्शी साल नामक एक ब्राह्मण था। तथागत को आमने-सामने

देखने के पश्चात् उसने उनकी प्रशंसा में निम्नलिखित स्तुति की थीः- 3. तथागत ने सम्मुख उपस्थित होकर, ब्राह्मण ने अभिवादन के पश्चात् बैठकर एक

महापुरुष के बत्तीस लक्षणों को देखने के लिये भगवान् के शरीर का अवलोक

किया और उन्हें देखा।

  1. महापुरुष के बत्तीस लक्षणों की उपस्थिति के विषय में पर्याप्त सुनिश्चित होने

पर भी साल अभी तक यह नहीं जान पाया कि उन्होंने बोधि प्राप्त कर ली है

या नहीं। किन्तु उसने वृद्ध और वय प्राप्त ब्राह्मणों और आचार्यों से यह सुन रखा

था कि जो अर्हत् होते हैं, सम्यक् सम्बुद्ध होते हैं, जब उनकी स्तुति की जाती

है, तो अपने आप को प्रकट कर देते हैं और इसलिये उसने तथागत की उनके

मुंह पर ही निम्नलिखित पंक्तियों में स्तुति एवं प्रशंसा करने की मन में ठानी।