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कि उनके द्वारा स्वीकार किये जाने चाहिये, क्योंकि उसे स्वयं उन्होंने अपने
हाथों से करघे पर उनके लिये बनाया है।
- तथागत ने उसे उत्तर दिया, ‘‘प्रजापति! इसे संघ को दे दें।’’
- दूसरी बार और तीसरी बार भी गौतमी ने अपनी प्रार्थना दोहराई, किन्तु उन्हें हर
बार समान उत्तर ही मिला।
- तब आनन्द ने यह कहते हुए, आग्रह किया, ‘‘भगवान्! प्रजापति गौतमी द्वारा भेंट
किया गया वस्त्र स्वीकार करें। गौतमी आपकी मौसी हैं। उन्हें सेविका (नर्स)
की तरह आपकी सेवा की है। जब आपकी मां की मृत्यु हो गई थी तो अपने
भानजे को अपना दूध पिलाया था। किन्तु तथागत ने यही कहा कि वस्त्र संघ
को ही दिया जाये।
- मूलतः संघ का यह नियम था कि सदस्यों के चीवर कूड़े के ढेरों पर से चुने
गये चीथड़ों से ही बनाये जाने चाहिये। यह नियम धनी वर्ग के लोगों के संघ
में प्रवेश को रोकने के लिये बनाया गया था।
- एक बार जीवक नए कपड़े से बना एक चीवर तथागत को स्वीकार कराने में
सफल हो गये थे। जब तथागत ने उसे स्वीकार कर लिया, तो साथ ही साथ
उन्होंने मूल नियम में छूट दे दी तथा भिक्खुओं को भी नया चीवर पहनने की
अनुमति प्रदान कर दी थी।