526 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘आओ! जो दूसरे बहुत से श्रमण ब्राह्मण हैं, उनसे भी पूछ लो, कि क्या सत्य,
संयम, दानशीलता और धैर्य से भी श्रेष्ठ कोई अन्य गुण है।’’ 27. यक्ष आलवक ने कहा, ‘‘अब, मैं किसी ब्राह्मण और श्रमण से क्यों सलाह लूँ?
आज मैं कल्याण अपने अच्छे भविष्य के ऐश्वर्य से परिचित हो गया हूं।’’ 28. ‘‘निस्संदेह! भगवान् बुद्ध मेरे कल्याण के लिये ही आलवी पधारे हैं। आज मैं
जानता हूँ, कि किसको, (दान) देने से अधिक से अधिक सर्वश्रेष्ठ फल मिलता
है।’’
- ‘‘आज से मैं सम्यक् सम्बुद्ध और उनके श्रेष्ठ धम्म को अपना आदर एवं श्रद्धा
अर्पित करते हुए, एक गाँव से दूसरे गाँव तथा एक नगर से दूसरे नगर विचरण
करूँगा।’’
5. समानता और समान-व्यवहार के समर्थक
- तथागत ने जो कुछ भी नियम संघ के सदस्यों के लिये बनाये थे, वे स्वेच्छा
तथा खुशी से उन्होंने स्वयं अपने ऊपर भी लागू किये थे।
- उन्होंने इस आधार पर कोई भी अपवाद या विशेष व्यवहार का दावा नहीं किया
था कि वे ‘संघ’ के स्वीकार्य प्रमुख हैं और उन्हें संघ द्वारा कोई भी सुविधा
उनके प्रति असीम आदर और प्रेम की भावना के कारण बड़ी प्रसन्नता से प्राप्त
हो सकती थी।
- संघ के भिक्षु एक दिन में केवल एक बार भोजन ग्रहण करते, तथागत द्वारा भी
यह नियम उसी प्रकार स्वीकार्य और पालन किया जाता था, जैसे कि भिक्षुओ
के द्वारा किया जाता था।
- भिक्षु के पास कोई व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती थी, तथागत के द्वारा यह
नियम उसी प्रकार स्वीकार्य और पालन किया जाता था, जैसे भिक्षुओ द्वारा किया
जाता था।
- संघ के किसी भी सदस्य के पास तीन चीवर से अधिक नहीं होना चाहिये।
यह नियम तथागत द्वारा भी उसी प्रकार स्वीकार्य और पालन किया जाता था,
जैसे भिक्षुओं के द्वारा किया जाता था।
- एक बार, जब तथागत शाक्य जनपद में कपिलवस्तु नगर के न्याग्रोधाराम में
रहते थे, तो तथागत की मौसी महाप्रजापति गौतमी अपने हाथ का कता, हाथ
का बुना कपड़ा तथागत के पास लेकर आयी, जिनके लिये उन्होंने प्रार्थना की