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1. उन्हें दरिद्रता पसंद नहीं थी

  1. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में विहार कर

रहे थे। वहां अनाथपिण्डिक गृहपति आया और तथागत का अभिवादन कर एक

ओर बैठ गया। इस प्रकार बैठे हुए उसने तथागत से प्रश्न किया, ‘‘भगवान्!

आदमी को धनार्जन क्यों करना चाहिए?’’

  1. भगवान् बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘क्योंकि तुम पूछ रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें बताता

हूं।’’

  1. ‘‘किसी एक आर्य-श्रावक को लो, जिसने मेहनत और लगन के साथ संपत्ति

अर्जित है, जिसने हाथों की शक्ति से, पसीना बहाकर, ईमानदारी और न्यायसंगत

तरीके से धन कमाया है, वह उस धन से अपने आप को प्रसन्न बनाता है,

आनंदित रहता है, वह अपने माता-पिता को सुखी और प्रसन्न करता है। इसी

प्रकार अपने पत्नी-बच्चों को, अपने दासों को, अपने कर्मकारों तथा अन्य आदमियों

को भी ऐसे ही रखता है। धनार्जन करने का पहला कारण यह है।’’

  1. ‘‘जब इस प्रकार धन प्राप्त होता है, तो वह अपने मित्रों और अपने साथियों

को प्रसन्न और आनंदित करता है। यह दूसरा कारण है।’’

  1. ‘‘जब इस प्रकार धन प्राप्त हो जाता है, तो वह बुरे समय से, अग्नि और पानी

से, राजाओं तथा चीरों, शत्रुओं तथा उत्तराधिकारियों से अपनी रक्षा करता है

और हानि नहीं होने देता, वह अपने माल को सुरक्षित रखता है। यह तीसरा

कारण है।’’

  1. ‘‘जब इस प्रकार धन अर्जित करता है, तो वह पांच प्रकार के कार्य करता है,

जैसे रिश्तेदारों, अतिथियों, राजाओं और देवताओं के लिए यज्ञ करता है। यह

चौथा कारण है।’’

  1. ‘‘जब इस प्रकार धन प्राप्त होता है, तो गृहपति उन सब श्रमणों तथा संत-पुरुषों

को दान देता है, जो अहंकार तथा प्रमाद से दूर रहते हैं, जो सभी बातों को

धैर्य और विनम्रता से सहन कर लेते हैं, जो संयत हैं, जो शांत हैं तथा जो श्रेष्ठ

बनने में लगे हैं। उसका वह दान महान साध्य के लिए होता है, सुख में वृद्धि

करने वाला और देवलोक की ओर ले जाने वाला होता है। यह धनार्जन का

पांचवां कारण है।’’

  1. अनाथपिण्डिक ठीक प्रकार से समझ गया कि भगवान् कुछ दरिद्रों की दरिद्रता

की प्रशंसा करके उन्हें सांत्वना नहीं देते। वे ‘दरिद्रता’ को अच्छा बताकर उसे

सुखी जीवन यापन नहीं कहते हैं।