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530 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

2. उन्हें संग्रह-वृत्ति नापसंद थी

  1. भगवान् बुद्ध एक बार कुरु जनपद के कम्मासदम्म नामक जनपद में ठहरे हुए

थे।

  1. आनन्द थेर भगवान् बुद्ध के पास वहाँ आए और झुककर अभिवादन कर एक

ओर बैठ गए।

  1. इस प्रकार बैठे हुए आनन्द ने थेर ने कहा, ‘‘तथागत द्वारा उपदेशित प्रतीत्य-समुत्पाद

का नियम अद्भुत है। यह अत्यंत गंभीर है, किन्तु मुझे यह अत्यंत स्पष्ट प्रतीत

होता है।’’

  1. भगवान् बुद्ध ने कहा, ‘‘आनन्द! ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो। यह

प्रतीत्य-समुत्पाद का नियम बहुत गंभीर है। इसी प्रतीत्य-समुत्पाद के नियम को

न समझ सकने के कारण, इसी प्रतीत्य-समुत्पाद के नियम को गम्भीरता से न

समझने के कारण, यह पीढ़ी उलझन में फंसी सूत के उलझे हुए गोले की तरह

है और दुःख के मार्ग को पार कर सकने में असमर्थ है।’’

  1. ‘‘मैंने कहा है कि तृष्णा होने से उपादान होता है। जहां किसी के मन में किसी

भी तरह की और किसी चीज के लिए कोई तृष्णा न हो, तो क्या किसी प्रकार

का भी उपादान पैदा होगा?’’

  1. ‘‘भगवान्! नहीं होगा।’’

  2. ‘‘तृष्णा होने से आदमी लाभ के पीछे भागता है।’’

  3. ‘‘लाभ के पीछे भागने से काम और राग उत्पन्न होते हैं।’’

  4. ‘‘काम और राग होने से वस्तुओं के लिए दुराग्रह उत्पन्न होता है।’’

  5. ‘‘दुराग्रह होने से अधिकार की भावना उत्पन्न होती है।’’

  6. ‘‘अधिकार की भावना होने से तृष्णा तथा और भी अधिक संपत्ति रखने की

इच्छा होती है।’’

  1. ‘‘अधिकार की भावना होने से संपत्ति की देख-भाल करने की आवश्यकता

पैदा होती है।’’

  1. ‘‘सम्पत्ति की देख-भाल में बुरी और अनैतिक बातें पैदा होती हैं। जैसे घूंसे तथा

घाव, कलह, झगड़े मिथ्यावाद और झूठ।’’

  1. ‘‘आनन्द! इस प्रकार यह प्रतीत्य-समुत्पाद नियम की शृंखला है। आनन्द! यदि

तृष्णा न हो, तो क्या लाभ के पीछे भागना होगा? यदि लाभ के पीछे भागना