4. वे सुसंगति से प्रेम करते थे - Page 562

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  1. भगवान् बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘आनंद! ऐसा मत कहो। आनंद! ऐसा मत कहो।

रमणीय से मित्रता, रमणीय से संसर्ग, रमणीय से घनिष्ठता-आधा नहीं, बल्कि

पूरा पवित्र जीवन है।’’

  1. ‘‘जो भिक्षु रमणीय का मित्र, साथी और घनिष्ठ है, उससे हम यह अपेक्षा

कर सकते हैं कि वह स्वयं में आर्य आष्टांगिक मार्ग को विकसित करेगा, वह

आष्टांगिक मार्ग से अधिक लाभान्वित होगा।’’

  1. ‘‘और आनंद! ऐसा भिक्षु आर्य आष्टांगिक मार्ग से कैसे अधिक लाभान्वित

होगा?’’

  1. ‘‘आनंद! यहां वह भिक्षु सम्यक दृष्टि में लगता है, जो अनासक्ति, विरक्ति,

स्तत्व-त्याग और स्वयं के समर्पण पर आधारित है। यह सम्यक संकल्प में लगता

है, जिसका आधार भी वही है, उसी प्रकार सम्यक व्यायाम, सम्यक कर्मांत,

सम्यक समाधि में लगता है, अंत में स्वयं का समर्पण करता है।’’ 8. ‘‘आनंद! इस प्रकार रमणीय का मित्र, रमणीय का साथी, रमणीय का घनिष्ठ

भिक्षु आर्य आष्टांगिक मार्ग में लगता है और उससे लाभान्वित होता है।’’ 9. ‘‘आनंद! यह विधि है, जिसके द्वारा तुम्हें समझना है कि किस प्रकार पवित्र

जीवन रमणीय से मित्रता, रमणीय से संसर्ग, रमणीय से घनिष्ठता में पूर्णता पाता

है।’’

  1. ‘‘आनंद! यथार्थ में, मरण-स्वभाव प्राणी, दुख, शोक, विलाप और निराशा को

प्राप्त होने वाले प्राणी, रमणीय से मित्रता होने के कारण इन सबसे मुक्त हो

जाते हैं।’’

  1. ‘‘आनंद! यह विधि है, जिसके द्वारा तुम्हें समझना है कि पूर्ण पवित्र जीवन

रमणीय के साथ, मित्रता से संसर्ग से और घनिष्ठता से बनता है।’’

(प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण वन, एकांत एवं सूना क्षेत्र एवं विपस्सना (ध्यान)

योग्य स्थान ही ‘रमणीय’ कहा जा सकता है।)