4. वे सुसंगति से प्रेम करते थे - Page 561

532 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

हो जाती है, कुशल धम्म में अनुरक्ति का अभाव दूर हो जाता है, कुशल धम्म

और उसमें अनुरक्ति उत्पन्न हो जाती है, अकुशल धम्म में अनुरक्ति के अभाव

में वृद्धि हो जाती है।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! मैं कोई दूसरी एक भी ऐसी चीज़ नहीं जानता, जिसमें इतनी

सामर्थ्य हो कि वह अनुत्पन्न बोधि अंगों को उत्पन्न होने से रोक सके, अथवा

उत्पन्न बोध्यंगों (बोधि अंगों) को पूर्णता तक पहुंचने से रोक सके, जैसे कि

असुव्यवस्थित ध्यान।’’

  1. ‘‘जो असुव्यवस्थित ध्यान का अभ्यास करता है, उसमें अनुत्पन्न बोधि अंग

उत्पल्न नहीं होते और उत्पन्न बोधि अंग पूर्णता को नहीं प्राप्त होते।’’ 8. ‘‘भिक्षुओ! सगे-संबंधियों की हानि कोई बड़ी हानि नहीं है। किन्तु प्रज्ञा की

हानि यथार्थ में ही दुःखद है।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! सगे-सम्बंधियों की वृद्धि कोई बड़ी अभिवृद्धि नहीं है। किन्तु प्रज्ञा

की वृद्धि सबसे बड़ी अभिवृद्धि होती है।’’

  1. ‘‘इसलिए भिक्षुओ! मैं कहता हूं कि तुम्हें इस प्रकार अभ्यास करना चाहिए,

हम प्रज्ञा में वृद्धि करेंगे। तुम्हें प्रज्ञावान बनने के लिए अवश्य अभ्यास करना

चाहिए।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! धन की वृद्धि कोई बड़ी अभिवृद्धि नहीं है। सभी अभिवृद्धियों में

श्रेष्ठ है प्रज्ञा की अभिवृद्धि। इसलिए हे भिक्षुओ! तुम्हें यही अभ्यास करना

चाहिए, हम प्रज्ञा में वृद्धि करेंगे। तुम्हें प्रज्ञावान बनने के लिए अवश्य अभ्यास

करना चाहिए।’’

  1. ‘‘भिक्षुओ! यश की हानि कोई बड़ी हानी नहीं है। प्रज्ञा की हानि दुःखद हानि

है।’’

4. वे सुसंगति से प्रेम करते थे

  1. एक बार तथागत शाक्य जनपद में शाक्यों के एक नगर सक्कर में ठहरे हुए

थे।

  1. तब आनंद तथागत के पास आए, अभिवादन करके एक ओर बैठ गए। इस

प्रकार बैठे हुए आनंद थेर ने कहा-

  1. ‘‘भगवान्! रमणीय से मित्रता, रमणीय से संसर्ग, रमणीय से घनिष्ठता आधा

पवित्र जीवन है।