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1. भगवान् बुद्ध की प्रशस्ति
भगवान् बुद्ध का जन्म पच्चीस सौ वर्ष पूर्व हुआ था।
आधुनिक विचारक और वैज्ञानिक उनके तथा उनके धम्म के विषय में क्या
कहते हैं? इस विषय पर उनके विचारों का संग्रह उपयोगी होगा। 3. प्रोफेसर एस.एस. राघवाचार्य कहते हैं-
- ‘‘भगवान् बुद्ध के अविर्भाव से ठीक पहले का काल भारतीय इतिहास के
सर्वाधिक अन्धकारमय युगों में से एक था।’’
- ‘‘बौद्धिक रूप से यह एक पिछड़ा युग था। उस समय के विचार धर्म-ग्रन्थों
की सत्ता के प्रति निर्विवाद अंधविश्वासों से जकड़ा हुआ था।’’ 6. ‘‘नैतिकता दृष्टि से यह एक अन्धकारमय युग था।’’
- ‘‘आस्तिक हिन्दुओं के लिये नैतिकता का अर्थ धर्म-ग्रन्थों के अनुसार अनुष्ठानों
और कर्मकाण्डों का उचित निष्पादन था।’’
- ‘‘यथार्थ नैतिक विचार जैसे आत्म-त्याग या चित्त की पवित्रता का उस समय
की नैतिक चेतना में यथोचित स्थान प्राप्त नहीं था।’’
माननीय आर.जे. जैक्सन का कथन है-
‘‘भगवान् बुद्ध की शिक्षाओं का विशिष्ट गुण भारतीय धार्मिक विचारधाराओं
के अध्ययन द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।’’
- ‘‘ऋग्वेद की ऋचाओं में हम मनुष्य के विचारों को बहिर्मुखी, स्वयं से दूर,
देवताओं के लोक की ओर देखते हैं।’’
- ‘‘बौद्ध धम्म ने मनुष्य की खोज को स्वयं के भीतर छुपी सामर्थ्य की ओर
आकर्षित किया।’’
‘‘वेदों में हमें प्रार्थना, प्रशंसा और आराधना मिलती है।’’
‘‘बौद्ध धम्म में ही पहली बार हम सम्यक् रूप से कार्य करने के लिए चित्त
का प्रशिक्षण पाते हैं।’’
माननीय विनवुड रीड कहते हैं-
‘‘जब हम प्रकृति की पुस्तक खोलकर देखते हैं, जब हम खून और आँसुओं से
लिखी, लाखों-करोड़ों वर्षों के विकास की कथा पढ़ते हैं, जब हम जीवन को
नियन्त्रित करने वाले नियमों, विकास के उत्पादक नियमों को पढ़ते हैं, तब हम
स्पष्टतया देखते हैं कि ईश्वर प्रेम स्वरूप है, यह सिद्धान्त कितना भ्रामक है।’’