536 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘प्रत्येक वस्तु में अन्यायपूर्ण चरित्रहीनता और असंयमित अपव्यय है। जितने भी
प्राणी जन्म लेते हैं, अंत में केवल बहुत थोड़े प्रतिशत बच पाते हैं।’’ 18. ‘‘समुद्र, आकाश और जंगल में केवल यही नियम लागू है कि दूसरों को खाओ
या दूसरों द्वारा खाये जाने के लिए तैयार रहो। हत्या ही विकास का नियम
है।’’
- माननीय रीडे ने अपनी ‘‘मारटरडम ऑफ मैन,’’ ( Martyrdom of Man ) नामक
पुस्तक में यही कहा है कि बुद्ध का धम्म कितना भिन्न है? 20. डॉ. रजन राय का कथन है-
- ‘‘उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान संरक्षण के तीन नियम प्रभावी थे।
किसी ने भी उनका विरोध नहीं किया।’’
- वे थे (1) जड़ पदार्थ का नियम पदार्थ, (2) जड़ पदार्थ के समूह का नियम
और (3) शक्ति का नियम।
- ‘‘वे उन आदर्शवादी चिन्तकों के तुरुप के पत्ते थे, जो उनके अविनाशी होने के
विचार की कदर करते थे।’’
- ‘‘उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक उन्हें सृष्टि के संचालक घटक स्वीकार करते
थे।’’
- ‘‘उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक उन्हें ब्रह्मांड की मूलभूत प्रकृति को समाहित
करने वाले तत्व स्वीकार करते थे।’’
- ‘‘वे समझते थे कि ब्रह्माण्ड अविनाशी अणुओं (Atoms) का समूह है।’’
- ‘‘ज्यों ही उन्नीसवीं शताब्दी अपनी समाप्ति के समीप पहुँच रही थी, सर जे. जे.
थामसन और उनके अनुयायियों ने अणुओं पर प्रहार करने प्रारम्भ कर दिये।’’ 28. ‘‘आश्चर्यजनक बात यह हुई कि अणु भी टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त होने शुरू
हो गये थे।’’
- ‘‘ये टुकड़े परमाणु कहे जाने लगे जो सभी समान थे तथा ऋणात्मक विद्युत से
संचालित थे।’’
- ‘‘जिन अणुओं को मैक्सवैल द्वारा ब्रह्माण्ड के अथवा वास्तविकता के अविनाशी
आधार-स्तम्भ के रूप में माना जाता था, वे खण्ड-खण्ड हो गये।’’ 31. ‘‘वे छोटे-छोटे खण्डों, प्रोटॉन और इलैक्ट्रोन (विद्युदणु) में खण्डित हो गये जो
क्रमशः घनात्मक और ऋणात्मक विद्युत से आवेशित थे।’’