44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘खेद है, उस बुद्धिमान नायक का हृदय अत्यंत कठोर है। उसका सौन्दर्य जो
देखने में इतना सुन्दर लगता है, अत्यंत कठोर और निर्दयी है। कौन ऐसा है,
जो शत्रु को भी मुग्ध कर लेने वाले, तोतली बोली बोलने वाले इस प्रकार के
बच्चे तक को छोड़कर चला जाए।’’
- ‘‘मेरा हृदय भी बहुत कठोर है, पत्थर या लोहे से बना हुआ, जो अपने स्वामी
के जंगल जाते समय भी नहीं पसीजा। वह राजकीय गर्व को, जो सुख पाने के
योग्य है, अनाथ बनाकर चले गए। लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा दुःख
मेरे लिए अस“य है।’’
- इसलिए अपने दुःख से होश-हवास खोकर यशोधरा जोर-जोर से विलाप करने
लगी। यद्यपि वह स्वभाव से धैर्यवान थी, लेकिन इस समय दुःख में वह अपना
धैर्य खो बैठी थी।
- इस प्रकार यशोधरा को दुःख में जोर-जोर से रोते और जमीन पर गिरी देखकर
सभी स्त्रियाँ चीखने लगीं। आँसुओं से भरे उनके चेहरे ठीक उसी प्रकार हो गए
थे, जैसे वर्ष से प्रताडि़त कमल हों।
- छन्न व कंथक दोनों के वापस लौट आने की बात सुनकर और अपने पुत्र का
दृढ़ निश्चय सुनकर शुद्धोदन दुःख से घायल हो गया।
- अपने पुत्र के लिए दुःख से उद्विग्न होकर अपने नौकर-चाकरों द्वारा सहारा देने
पर शुद्धोदन ने घोड़े की ओर देखा तो उसकी आँखें अश्रुपूर्ण हो रही थीं। इसके
बाद वह जमीन पर गिर पड़ा और विलाप करने लगा।
- तब शुद्धोदन उठा और अपने मंदिर में गया। उसने प्रार्थना की, मांगलिक क्रियाएँ
कीं और अपने पुत्र की सकुशल वापसी के लिए कुछ खास मन्नतें मांगीं।
- इस प्रकार शुद्धोदन, गौतमी और यशोधरा यह कहते हुए अपने दिन बताने
लगे-‘‘हे देव! कितने दिनों के बाद हम उसे फिर से देख सकेंगे?’’