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ढोल या बादल के समान गम्भीर आवाज हो, क्या वैसा महान व्यक्ति आश्रम
में रह सकता है?’’
- ‘‘यह पृथ्वी ही अब रहने लायक नहीं रह गई है, क्योंकि अच्छा कार्य करने
वाला आदर्श नायक हम लोगों को छोड़कर चला गया है।’’
- ‘‘जिसके दोनों पैर के अंगूठे के बीच सुन्दर जाली हो, जिसके चरणकमल
नीले कमल की तरह सुन्दर हों, जिसके बीच में चक्र चिन्ह हो वह जंगल की
पगडंडी की कठोर भूमि पर कैसे चल सकेगा?’’
- ‘‘वह शरीर, जो महल की छत के तले रहने-लेटने योग्य है, जो बहुमूल्य
आभूषणों, और चन्दन से अलंकृत रहता था, वह पुरुषोचित शरीर वाला जंगलों
में कैसे रहेगा, जहाँ सर्दी, गर्मी और वर्षा से बचने का कोई उपाय नहीं।’’
- ‘‘जिसे अपने परिवार शील, शक्ति, बल, पवित्र, विद्या, सौन्दर्य और यौवन का
अभिमान था, जो हमेशा देने को तैयार रहता था, जो किसी से कुछ नहीं लेता
था, वह दूसरों से भिक्षा कैसे मांगेगा?’’
- ‘‘वह जो स्वच्छ सुनहरी शय्या पर सोता था, जिसे मधुर संगीत वाद्यों की
झनकार से जगाया जाता था, वह मेरा तपस्वी अब सिर्फ एक कपड़े के साथ
कठोर जमीन पर कैसे सोएगा?’’
- इस दयनीय विलाप को सुनकर स्त्रियाँ एक-दूसरे को अपनी बाहों में पकड़े हुए
अपनी आँखों से आँसू ठीक वैसे ही बरसा रही थीं, जैसे लताओं को हिलाने
पर उनके फूलों से मधु बरसता है।
- तब यशोधरा यह भूलकर कि उसने ही उसे जाने की अनुमति दी थी, जमीन
पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।
- ‘‘उसने मुझ जैसी पतिव्रता पत्नी को कैसे छोड़ दिया? उसने मुझे विधवा बनाकर
छोड़ दिया। वह अपने नए जीवन में अपनी धर्मपत्नी को संगी-साथी बना सकता
था।’’
- ‘‘मुझे स्वर्ग की कोई इच्छा नहीं है। मुझे एक ही अभिलाषा थी कि मेरा पति
मुझे इस जीवन में और न परलोक में मेरा साथ न छोड़े।’’
- यदि मैं अपने पति की बड़ी-बड़ी आंखों वाले और सुन्दर मुस्कुराहट वाले चेहरे
को देखने लायक नहीं हूँ, तो क्या बेचारा राहुल भी अपने पिता की गोद में
लेटने योग्य नहीं है?’’