46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. कपिलवस्तु से राजगृह तक
- कपिलवस्तु छोड़ने के बाद सिद्धार्थ गौतम ने मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह
जाने पर विचार किया।
- वहाँ का राजा बिम्बिसार था। उस समय राजगृह बड़े-बड़े दार्शनिकों और पंडितों
का मुख्य स्थान था।
इस विचार से उसने तेज धारा से न डरते हुए गंगा पार की।
रास्ते में वह सकी नाम की ब्राह्मण स्त्री के आश्रम में रुका, उसके बाद पद्मा
नाम की दूसरी ब्राह्मण स्त्री के आश्रम में रुका, फिर वह ब्राह्मण ऋषि रैवत
के आश्रम में रुका। सभी ने उसका स्वागत किया।
- उसका व्यक्तित्व, उसका तेजस्वपूर्ण गौरव और उसका अनुपम सौन्दर्य देखकर
उस प्रदेश के सभी लोगों को बहुत आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा पुरुष संन्यासी
के वस्त्र कैसे पहने है?
- उसको देखकर, जो कहीं जा रहे थे खड़े हो गए, जो खड़े थे वे उसके साथ
चलने लगे, जो धीरे-धीरे चल रहे थे, वे तेजी से दौड़ने लगे और जो बैठे थे
तुरंत उठकर खड़े हो गए।
- कुछ लोगों ने हाथ जोड़कर उसे नमस्कार किया, कुछ ने उसे सिर झुकाकर
प्रणाम किया, कुछ ने प्रेम-वचनों से उसे सम्बोधित किया। कोई भी ऐसा नहीं
था, जिसने उसको आदर-भाव न दिखाया हो।
- जो चमकीले रंग-बिरंग वस्त्र पहने थे, वे उसे देखकर लज्जित हुए, जो इधर-उधर
की बातें कर रहे थे, वे चुप हो गए। किसी के मन में कोई अनुचित विचार
नहीं आया।
- उसकी भौंहें, उसका ललाट, उसका मुँह, उसका शरीर, उसके हाथ, उसके पैर
या उसकी चाल, जो कोई भी उसके शरीर का कोई भी भाग देखता, अचानक
मंत्र-मुग्ध सा उसे देखता रह जाता।
- बड़ी लम्बी और कठिन यात्रा के बाद गौतम राजगृह पहुँचा, जो पाँच पहाडि़यों से
घिरा हुआ था, जो पहाड़ों से अलंकृत और सुरक्षित था जहाँ अनेक मंगलकारी
एवं पवित्र स्थान थे।
- राजगृह पहुंचकर उसने पांडव पहाड़ी के नीचे एक जगह चुनी और अपने निवास
के लिये, वहाँ उसने पत्तियों की एक छोटी झोंपड़ी बना ली।