1. भृगु आश्रम पर पड़ाव - Page 89

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

1. भृगु आश्रम पर पड़ाव

  1. अन्य पंथों का परीक्षण करने के उद्देश्य से सिद्धार्थ गौतम ने आलार कालाम से

भेंट करने के लिए राजगृह छोड़ दिया।

  1. रास्ते में उसने भृगु ऋषि का आश्रम देखा और उत्सुकतावश उसमें प्रवेश

किया।

  1. आश्रम के ब्राह्मण सहवासी जो ईंधन लाने के लिए बाहर गए थे- जो अभी-अभी

लौटे थे। तपस्या के लिए आवश्यक वस्तुएं समिधा, फूल और कुश घास उनके

हाथ में थी। वे बुद्धिमान सहवासी अपनी-अपनी कुटिया में न जाकर गौतम की

ओर मुड़कर देखने लगे।

  1. तब आश्रमवासियों द्वारा स्वागत होने के बाद उसने भी आश्रम के वयोवृद्ध लोगों

को आदर दिया।

  1. उस मोक्ष-प्रेमी बुद्धिमान सिद्धार्थ ने उन स्वर्ग चाहने वालों को विचित्र-विचित्र

प्रकार की तपस्याओं का निरीक्षण करते हुए आश्रम को देखा।

  1. उस भद्र पुरुष ने पहली बार उस उपवन में सन्यासियों को विभिन्न प्रकार की

तपस्या करते देखा।

  1. तब तपस्या की तकनीक में दक्ष भृगु ब्राह्मण ने विभिन्न प्रकार की तपस्याएं

और उनके फल के बारे में गौतम को बताया।

  1. बिना पका भोजन, पानी से उत्पन्न मूल और फल-यही धर्मशास्त्रों के अनुसार

तपस्वियों का भोजन है, लेकिन तपस्या के भिन्न-भिन्न अनेक रूप हैं।

  1. कुछ पक्षियों की तरह दाने चुगते हैं, कुछ हिरणों की तरह घास खाते हैं, कुछ

सांपों की तरह हवा पर जीते हैं, ऐसा लगता है कि वे पहाड़ी चींटी में परिवर्तित

हो गए हों।

  1. दूसरे बड़ी मुश्किल से पत्थर से अपना पोषण करते हैं, कुछ अपने दाँतों से ही

पीसकर अन्न खाते हैं, कुछ दूसरों के लिए उबालते हैं और भाग्यवश कुछ बचे

पर ही गुजारा करते हैं।

  1. कुछ अपनी जटाओं को लगातार पानी में भिगोते रहते हैं, और मंत्रोच्चारण के

साथ दो बार अग्नि देवता अर्ध्य अर्पण करते हैं_ दूसरे मछली की तरह पानी

में डूबे रहते हैं और उनके शरीर को कछुएं नोचते रहते हैं।