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- कुछ समय के लिए इस प्रकार की तपस्या करने, अधिक कष्ट सहने पर स्वर्ग
और कम कष्ट सहने पर मानव-लोक प्राप्त होता है। कष्ट सहने के पथ पर
चलकर अंत में वे सुख को प्राप्त करते हैं। उनका कहना है कि कष्ट-सहन
ही पुण्य का मूल है।
- यह सुनकर गौतम ने कहा-‘‘आज पहली बार मैंने ऐसा आश्रम देखा है और
तुम्हारा यह तपस्या क्रम समझ में नहीं आता।’’
- ‘‘इस समय मैं केवल इतना कहूँगा कि आपकी यह लगन स्वर्ग प्राप्त करने
के लिए है, जबकि मेरी इच्छा तो यही है कि संसार के दुःख के मूल कारण
और उसे दूर करने का उपाय खोज निकाला जाए। क्या अब मैं यहाँ से विदा
ले सकता हूँ? मैं सांख्य दर्शन सीखना चाहता हूँ और समाधि मार्ग में अपने को
प्रशिक्षित करना चाहता हूँ और देखना चाहता हूँ कि ये पद्धतियाँ मेरी समस्या
के समाधान में कितनी सिद्ध हो सकती हैं।’’
- ‘‘आप लोग अपने मार्ग पर अग्रसर हैं, आप लोगों ने मुझे शरण दी और इतना
प्यार दिया कि अब मैं सोचता हूँ कि मुझे आप लोगों को छोड़कर जाना पड़ेगा,
तो मुझे ठीक वैसा ही दुःख हो रहा है, जैसा मुझे अपने सगे-संबंधियों को
छोड़ने पर हुआ था।’’
- ‘‘किसी नापसंदगी या किसी के गलत आचरण के कारण मैं इस वन को नहीं
छोड़ रहा हूँ। आप लोग तो बड़े ऋषि हैं और पहले के ऋषियों के अनुसार
अच्छी तरह अपना धार्मिक दायित्व निभा रहे हैं।’’
‘‘अपने विषय में दक्ष मुनि आलार कालाम के पास मैं जाना चाहता हूँ।’’
उसके निश्चय को देखकर आश्रम के प्रमुख भृगु ऋषि ने कहा ‘‘राजकुमार!
तुम अपने उद्देश्य में बहादुर हो, तुम नवयुवक हो। स्वर्ग और मोक्ष का अच्छी
तरह मनन करने के बाद तुम मोक्ष का लाभ प्राप्त करना चाहते हो। तुम सचमुच
बहादुर हो।’’
- ‘‘यदि तुम्हारे कहने का यही दृढ़ निश्चय है तो तुम अतिशीघ्र ही विंध्य-प्रदेश जाओ,
जहाँ मुनि आलार कालाम रहते हैं, जिन्होंने परम सुख की अन्तर्दृष्टि पाई है।’’
- ‘‘तुम उनके मार्ग का ज्ञान प्राप्त करोगे, लेकिन जैसा कि मैं देख रहा हूँ तुम
उनसे उनके सिद्धांत को सीखकर और आगे निकल जाओगे।’’
- गौतम ने उनको धन्यवाद दिया और ऋषिगण को नमस्कार करके चल दिया।
संन्यासीगण भी उसके प्रति शिष्टाचार निभाने के बाद अपने तपस्वी उपवन में
पुनः प्रस्थान कर गए।