70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. नए प्रकाश हेतु ध्यान
- भोजन से अपने आपको तरोताजा करके गौतम बैठकर अपने पूर्व अनुभवों पर
विचार करता रहा। उसे लगा कि अभी तक अपनाए सारे रास्ते असफल हो गए
हैं।
- असफलता इतनी अधिक थी कि वह किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण रूप से
निराशावस्था में ला सकती थी। निस्संदेह वह दुःखी था। लेकिन वैसी निराशा
उसे छू तक नहीं पाई थी।
- रास्ता खोजने के प्रति वह हमेशा आशावान् रहता था। इतना अधिक कि जिस
दिन उसने सुजाता की खीर खाई थी, उस रात को उसने पाँच स्वप्न देखे और
जब वह जागा और उसने उनकी व्याख्या की, तो पाया कि उसे बोधि प्राप्ति
अवश्य होगी।
- उसने अपने भविष्य की भविष्यवाणी करने की कोशिश की। उसने सुजाता की
दासी द्वारा लाई गई खीर के पात्र को नेरंजरा नदी में फेंक दिया और कहा-‘‘यदि
मुझे बोधि प्राप्त होने वाली है, तो यह पात्र धारा की सतह पर ऊपर की ओर
जाए और अगर नहीं तो नीचे की ओर जाए।’’ सचमुच पात्र धारा के विपरीत
तैरने लगा और नागराज काल के निवास के पास जाकर डूब गया।
- आशा और दृढ़ता से भरकर उसने उरूबेला को छोड़ा और शाम तक राजमार्ग
होते हुए गया जा पहुँचा। वहाँ उसने एक पीपल का वृक्ष देखा। उस नए प्रकाश
की आशा में, जिसके द्वारा वह अपनी समस्या का समाधान निकाल सके उसने
ध्यानावस्था में वृक्ष के नीचे बैठने के लिए सोचा।
- चारों दिशाओं के निरीक्षण के बाद उसने पूर्व दिशा को चुना। क्लेश दूर करने
के लिए महान ऋषि लोग हमेशा ही पूर्व दिशा को ही चुनते आए हैं।
- पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम पद्मासन में सीधा बैठा। ज्ञान प्राप्ति के लिए
दृढ़संकल्प हो उसने अपने आप से कहा ‘‘चाहे मेरी त्वचा, नसें और हड्डियाँ
जितना सूख जाएँ, मेरा माँस और खून मेरे शरीर में चाहे सूख जाए, किन्तु बोधि
प्राप्त किए बिना मैं इस आसन को नहीं छोडूँगा।’’
- नाग-राज के समान ऐश्वर्य वाला काल नामक नाग-राज और उसकी पत्नी सुवर्ण
प्रभा पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ गौतम के दर्शन से जाग्रत हो उठे थे। उन्हें
यह विश्वास था कि वह बोधि प्राप्त करेगा। उन्होंने इस प्रकार स्तुति की-