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- वह निश्चित रूप से बोधि प्राप्त करेगा-ऐसा विश्वास कर उसकी प्रशंसा में
उन्होंने कहा-‘‘हे मुनि, क्योंकि तुम्हारे पाँव से दबी यह पृथ्वी बार-बार गुंजायमान
होती है, और सूर्य के समान तुम्हारा तेज है, इसलिए तुम इच्छित फल अवश्य
पाओगे।’’
- ‘‘आकाश में फड़फड़ा कर उड़ते हुए पक्षियों के झुंड तुमको सादर नमस्कार
करते हैं। हे कमल नयन! मंद पवन आकाश में बहता है, इसीलिए तुम बोधि
अवश्य पाओगे।’’
- जब वह ध्यानस्थ अवस्था में बैठा था, तो बुरे विचारों और बुरी कुप्रवृत्तियों के
झुंड ने, जिन्हें पौराणिक भाषा में मारपुत्र कहा गया है, उसने गौतम पर आक्रमण
कर दिया।
- गौतम काफी भयभीत हो गया और लगा कि कहीं वे उसको काबू में न कर
लें और उसके उद्देश्य को विफल न कर दें।
- वह जानता था कि इन बुरी कुप्रवृत्तियों के युद्ध में बहुत से ऋषि और ब्राह्मण
पराजित हो चुके हैं।
- इसलिए अपना सारा साहस बटोर कर उसने मार से कहा-‘‘मुझमें श्रद्धा, वीरता
और प्रज्ञा है। कुप्रवृत्तियाँ मुझे कैसे पराजित कर सकती हैं। वायु चाहे इस नदी
के प्रवाह को सुखा दे, तो भी तुम मेरे निश्चय से मुझे नहीं डिगा सकते। जीवन
में पराजय से अच्छा मेरे लिए मर जाना श्रेयस्कर है।’’
- गौतम के मन में कुप्रवृत्तियाँ उस कौवे की भाँति प्रवेश कर गईं, जो पत्थर को
मांस का ढेर समझकर उस पर चोंच मारता है कि ‘‘यहाँ कुछ मधुर-मीठा
स्वादिष्ट कौर मुझे अवश्य मिलेगा।’’
- और वहाँ कुछ भी मिठास न पाकर कौवा वहाँ से भाग जाता है। इसलिए पत्थर
पर चोंच मारने वाले कौवे की भाँति कुप्रवृत्तियाँ विवश होकर गौतम को छोड़कर
चल दीं।
2. ज्ञान-प्राप्ति
- ध्यान के दौरान खाने के उद्देश्य से गौतम ने इतना भोजन जमा करके रख लिया
था कि वह चालीस दिनों तक चलता रहे।
- मन को अशांत करने वाले बुरे विचारों को जड़ से समाप्त कर गौतम ने भोजन