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करने का अधिकार नहीं था। वह एक व्यक्ति तो था, लेकिन नागरिक नहीं था। अछूत को शिक्षा और जल प्रदाय की सबसे अधिक आवश्यकता थी। उसे संरक्षण के लिए पद की सबसे अधिक आवश्यकता थी। गरीबी के कारण उस पर कोई कर नहीं लगाया जाना चाहिए था। लेकिन स्थिति बिल्कुल विपरीत थी। अछूत को स्पृश्य की शिक्षा के लिए करों का भुगतान करना पड़ता था। स्पृश्यों को जल की पूर्ति के लिए अछूतों को करों का भुगतान करना पड़ता था। दफतरों में काम करने वाले स्पृश्यों के वेतन का भुगतान करने के लिए अछूतों पर कर लगाए जाते थे। अंग्रेजों की जीत से अछूतों को क्या लाभ हुआ था? शिक्षा में कुछ नहीं, नौकरियों में कुछ नहीं, प्रतिष्ठा में कुछ नहीं। केवल एक चीज में उन्हें लाभ हुआ था और वह है कानून की नजर में समानता। वास्तव में इसमें कोई विशेष बात नही है, क्योंकि कानून के सामने समानता सबके लिए समान है। वास्तव में इसमें कोई ठोस बात नहीं है, क्योंकि जो पदासीन होते हैं वे प्रायः अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हैं और अछूतों को इस नियम के लाभ से वंचित रखते हैं। इस स्थिति में कानून की नजर में समानता के सिद्धान्त से अछूतों को यह विशेष लाभ हुआ कि अंग्रेजों के दिनों से पहले उन्हें यह अधिकार कभी नहीं मिला। मनु के कानून में समानता के सिद्धान्त को कभी मान्यता नहीं दी गयी। असमानता, मनु के कानून की आत्मा थी। यह जीवन के सभी व्यवसायों, सभी सामाजिक सम्बन्धों और राज्य के सभी विभागों में व्याप्त थी। इसने हवा को दूषित कर रखा था, जिसमें अछूतों के लिए साँस लेना कठिन हो गया था। कानून की नजर में समानता के सिद्धान्त ने मलिनता दूर करने का काम किया है। इसने हवा को शुद्ध किया है और अछूत आजादी की साँस ले सकता है। अछूतों को वास्तव में यह लाभ हुआ है और प्राचीन काल का ध्यान रखते हुए यह लाभ कम नहीं है।