प्रस्तावना - Page 143

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

प्रस्तावना

ये अंग्रेजी संविधान पर व्याख्यान हैं, जो मैंने सरकारी विधि महाविद्यालय बम्बई के छात्रों के समक्ष 1934-35 में दिये थे। इन व्याख्यानों को प्रकाशित कराने में, मैं यह नहीं भूला हूँ कि एक भारतीय के लिए अंग्रेजी संविधान के सिद्धान्तों की व्याख्या करने का प्रयास करना कितना धृष्ट समझा जाएगा। सर आस्टिन चैम्बर लेन ने भारतीय संवैधानिक सुधारों सम्बन्धी संयुक्त समिति के समक्ष उपस्थित हुए कुछ भारतीय साक्षियों से जिरह के दौरान यह टिप्पणी की कि जब कोई साक्षी भारत की परिस्थितियों की बात करता है मैं उसे बड़े आदर के साथ ध्यान से सुनता हूँ। लेकिन जब वह अंग्रेजी संविधान की व्याख्या करता है, तो मैं अपेक्षा करता हूँ कि वह मुझे अपनी राय पर कायम रहने दे।

जो भी हो सर आस्टिन चैम्बर लेन की टिप्पणी मेरे रास्ते में नहीं आ सकती। मैं अपनी ओर से कोई व्याख्या नहीं कर रहा हूँ। मैं इसे अंग्रेजों को नहीं समझा रहा हूँ। मैं केवल डिके के अंग्रेजी संविधान का सरल बना रहा हूँ ताकि भारतीय छात्र उसे समझ सकें और उसका पालन कर सकें। भारतीय छात्रों की दृष्टि से डिके के निबन्ध में दो दोष हैं। इसमें यहाँ मान लिया गया है कि पाठकों को अंग्रेजी संविधान के कुछ भागों की पहले ही जानकारी होगी। उदाहरण के तौर पर इसमें यह मान लिया गया है कि लोगों को यह पूर्व जानकारी है कि संसद क्या है यह कैसे बनती है और यह किस प्रकार काम करती है? अंग्रेज छात्रों के मामले में यह परिकल्पना कितनी ही उचित क्यों न हो, उनके मामले में इसका कोई औचित्य नहीं है जो डिके के निबन्ध को पहली बार पढ़ते हैं। अंग्रेजी संविधान के इस भाग की पूरी जानकारी के बिना भारतीय छात्र बुरी तरह घबरा जाता है। और वे विधि शासन की प्रधानता, अथवा संविधान के कार्यकरण में परम्पराओं की भूमिका जैसे मूलभूत सिद्धान्तों के पूरे महत्त्व को नहीं समझ पाते। यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारतीय छात्र इन सिद्धान्तों के महत्त्व के बारे में डिके की व्याख्या को अच्छी तरह समझ सकें, अध्यापक को हर बार अंग्रेजी संविधान का वह ढाँचा छात्रों के सामने प्रस्तुत करना पड़ता है, जिसका डिके के निबन्ध में कोई उल्लेख नहीं है। दूसरे जहाँ तक विधि नियमों और परम्पराओं का सम्बन्ध है, डिके के अंग्रेजी संविधान के अन्तिम संस्करण के प्रकाशित होने के पश्चात अंग्रेजी संविधान में काफी विकास हुआ है। इस विकास का परिणाम दो अलग तरीकों से महसूस किया गया है। इसका एक परिणाम तो यह हुआ है कि डिके ने जो उदाहरण दिये हैं वे बिल्कुल असंगत हो गये हैं। दूसरे, विशेष रूप से डोमीनियनों के साथ राजा/रानी और ब्रिटिश संसद के सम्बन्धों के मामले में ब्रिटिश संविधान के चरित्र में इतना अधिक परिवर्तन हुआ है कि एक भारतीय की जानकारी जो केवल डिके पर निर्भर कता है, अद्यतन नहीं होगी और उसे इसकी बहुत सी बातों की जानकारी नहीं होगी। कुछ सामग्री जोड़ दिये जाने और रूप बदल दिये जाने के अलावा इन व्याख्यानों में कुछ नहीं है। डिके के निबन्ध में जो दोष