अध्याय-2 : प्रभुता और भारतीय रियासतों की स्वतन्त्रा होने की माँग - Page 181

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

में सम्मिलित न होने की सलाह देता है, वास्तव में राजकुमार के शत्रु का काम करता है। निस्सन्देह संघ में सम्मिलित होने पर एक उत्तरदायी सरकार बनानी होगी, लेकिन इससे यह लाभ है कि संघ राजकुमारों को राजवंशीय उत्तराधिकार के अधिकारों की गारंटी देगा। एक राजकुमार अधिक से अधिक इसकी ही आशा कर सकता है। स्वतन्त्र रहना और संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता तथा सुरक्षा प्राप्त करने की आशा करना स्वप्नलोक में रहना है। इसमें सन्देह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ उन भारतीय रियासतों को मान्यता देगा, जो भारत के उन पर अधिराज्य के दावे की उपेक्षा करेंगे। लेकिन यदि ऐसा होता है तो भी संयुक्त राष्ट्र संघ किसी भारतीय रियासत को इस बात पर बल दिये बिना आक्रमण या आन्तरिक अशान्ति के मामले में कोई सहायता प्रदान नहीं करेगा कि रियासत को पहले अपने क्षेत्र में उत्तरदायी सरकार बनानी चाहिए। ये सभी चीजें स्पष्ट हैं। जो इससे बचना चाहते हैं उन्हें यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि जो इसकी उपेक्षा करेंगे, उनकी वही दशा होगी जो अपने स्वार्थ में डूबे लोगों की होती है।

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