165
बनी रहेगी जो इनकी अब है। जिस कदर ये इस समय प्रभुता सम्पन्न राज्य है उसी तरह वे बाद में बने रहेंगे। लेकिन जब तक वे अधिराज्य के नियन्त्रण में रहेंगे तब तक वे स्वतन्त्र राज्य नहीं हो सकते क्योंकि यदि भारत एक डोमीनियन बना रहता है तो वे राजा के नियन्त्रण में रहेंगे और भारत आजाद हो जाता है तो वे भारत सरकार के नियन्त्रण में रहेंगे।
जब तक अधिराज्य बना रहेगा वे कभी भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते। रियासतें अपने आप को स्वतन्त्र घोषित कर सकती हैं, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि जब तक अधिराज्य टिका रहेगा और भारत के आजाद होने पर भी इसे टिका रहना चाहिए, भारत उनकी स्वतन्त्रता को मान्यता नहीं देगा। और बाहर के देश भी उन्हें स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देंगे। केवल एक मार्ग जिसके द्वारा भारतीय रियासतें अपनी प्रभुता स्वतन्त्र कर सकती हैं वह है प्रभुता और अधिराज्य का विलय। यह तभी सम्भव हो सकता है जब रियासत भारत संघ में मिल कर भारत का अंग हो जाएँ। रियासतों के प्रवक्ताओं को यह जान लेना चाहिए किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वे इसे भूल गये हैं। अतः उन्हें यह याद दिलाना आवश्यक है कि गोल मेज सत्र में क्या हुआ था। आरम्भ में रियासतें संघ में आने को तैयार नहीं थीं। वे संघर्ष के लिए तब तैयार हुईं, जब उन्हें मालूम हुआ क बटलर समिति ने यह सिद्धान्त बनाया है कि प्रभुत्व प्रभुसत्ता है। विचारों में यह परिवर्तन तब आया, जब उन्होंने अनुभव किया कि जितनी प्रभुसत्ता संघ को हस्तांतरित की जाएगी उतनी ही प्रभुसत्ता लुप्त हो जाएगी। वास्तव में जैसा कि हममें से अधिकांश लोग जानते हैं राजकुमारों ने यह प्रश्न राज्य के सचिव के समक्ष उठाया और उससे कहा कि सूची संख्या एक में सम्मिलित विषयों को निष्कासित कर के प्रभुता के दायरे को सीमित किया जाना चाहिए। राज्य के तत्कालीन सचिव के पास देने के लिए कोई उत्तर नहीं था और उसने गुस्सा दिखाकर उनको चुप करा दिया। राज्य के सचिव के रूप की ओर ध्यान न दिया जाये तो भी बात यह है कि राजकुमारों की समझ में यह बात आ गयी थी कि संघ में सम्मिलित होने से ही प्रभुता समाप्त हो सकती है। यह बात जितनी पहले मान्य थी उतनी आज भी है। भारतीय रियासतों के लिए विवेकपूर्ण यही होगा कि वे इसी सिद्धान्त का पालन करें और आजादी की मृग मरिचिका में न पड़ें। अतः भारत के लोगों को केबिनेट मिशन के इस प्रस्ताव को ठुकरा देना चाहिए कि प्रभुता समाप्त हो जाएगी। उन्हें इस बात पर बल देना चाहिए कि प्रभुता समाप्त नहीं हो सकती और वे उस प्रभुता के उत्तराधिकारी हैं। वे उन भारतीय रियासतों की तरह इसका प्रयोग करते रहेंगे जो अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी संघ में सम्मिलित नहीं होते। दूसरी ओर राज्यों को यह महसूस करना चाहिए कि प्रभुसत्ता सम्पन्न भारतीय रियासतों के रूप में उनका अस्तित्व पाँच वर्षों की आय के बराबर भी नहीं है। यह राजकुमारों के हित में है कि वे संघ में सम्मिलित हों और संवैधानिक राजा बन जाएँ। कोई दीवान जो राजकुमार को संघ