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अंग्रेज भारतीय माल पर विभेदकारी शुल्क ही नहीं लगाते थे, बल्कि शुल्क लगाते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाता था कि वह वस्तु इंग्लैंड में किस काम आती है। यह तथ्य 1813 में हाउस ऑफ कॉमन्स की समिति के प्रश्नों पर श्री जौन राकिंग के उत्तरों से स्पष्ट हो जाएगा।
प्र. फ्क्या आप बता सकते हैं कि ईस्ट इंडिया हाउस में बेचे जाने वाले कपड़े के थानों पर यथा मूल्य शुल्क क्या है?य्
उ. फ्कैलीको के कपड़ों पर 3 पौंड 6 शिलिंग और 8 पेंस प्रतिशत की दर से आयात शुल्क लगता है। और यदि उनका उपयोग घरेलू खपत के लिए होता है, तो उस पर 68 पौंड 6 शिलिंग 18 पेंस प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगता है। एक अन्य किस्म का कपड़ा मलमल, जिसके आयात पर 10 प्रतिशत शुल्क लगता है और इसका घरेलू खपत के लिये इस्तेमाल किये जाने पर 27 पौंड 6 शिलिंग 8 पेंस प्रतिशत लगता है। तीसरी किस्म में रंगीन कपड़े आते हैं जिनका इंग्लैंड में उपयोग नहीं किया जा सकता उन पर 3 पौंड 6 शिलिंग 8 पेंस फीसदी शुल्क लगता है। इनका केवल निर्यात होता है।
संसद के इस सत्र में 20 फीसदी शुल्क लगाया गया है। इस शुल्क को मिलाकर घरेलू खपत कें काम आने वाले कैलीको कपड़ों पर 78 पौंड 6 शिलिंग 8 पेंस फीसदी शुल्क लगेगा और घरेलू खपत के काम आने वाली मलमल पर कुल 31 पौंड 6 शिलिंग 8 पेंस प्रतिशत शुल्क लगेगा।य्
इतनी वसूली तो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसद द्वारा की जाती थी। गवर्नरों तथा गवर्नर जनरलों द्वारा वसूल की जाने वाली राशि भी किसी तरह कम नहीं थी। यहाँ सर डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर के शब्दों को स्मरण करना आवश्यक है। भारत के सम्पर्क में आने पर यूरोप के लोगों के मनोबल का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा हैµ मध्ययुगीनता से निकला ही था और एशियाई शासन यूरोप में अपने पहले प्रयोग कर रहा था। जीत की मध्यकालीन भावनाओं ने उसे पूर्वी दुनिया का शोषण करने के लिए बाध्य किया। मध्यकालीन प्रकार का वाणिज्य भारतीय व्यापार में जारी रखा गया। इन धारणाओं के प्रभावशाली होने पर पुर्तगाल, स्पेन, हालैंड ने एशिया में अपनी सत्ता जमा ली। अंग्रेज भारत में बाद में सत्ता में आये। उन्होंने यूरोप के सोलहवीं शताब्दी के आदर्शों के स्थान पर अठारहवीं शताब्दी के आदर्शों को मूर्त रूप दिया। यह अर्थ मध्यकालीन ईसाइयत का नया रूप था। फिर भी इंग्लैंड के लिए समय की परम्पराओं को तोड़ना अर्थात भारतीय व्यापार पर एकाधिकार और भारत सरकार का शासकों के अपने लाभ के प्रयोग करने की परम्परा को तोड़ना कठिन था। ख्1, स्वार्थ ने अवश्य ही भ्रष्ट विधानमंडल को विचलित किया परंतु राजनीति की बातें हमेशा
- डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर, ‘ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’, भाग-1, पृष्ठ 6