128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(2) बेचने का अधिकार - 67/69
(3) बंधक धन के लिए वाद लाने का अधिकार - 68
(4) विक्रय एवं अर्जन पर धन का दावा करने का अधिकार - 73 2. यह डिक्री प्राप्त करने के लिए वाद कि बंधककर्त्ता-बंधक संपत्ति के मोचन के
अधिकार से पूर्णतः विवर्जित कर दिया जाएगा पुरोबंध के लिए वाद है।
टिप्पणी -
(1) बंधक धन का अभिप्राय संपूर्ण बंधक धन नहीं होता है। यदि बंधक किश्तों
द्वारा चुकाया जाना है तो यह बंधकों के लिए मूलधन को किसी किश्त एवं
ब्याज के लिए वाद लाने की छूट है। -
13 एम.एल.आई.-2
(2) एक अभिव्यक्त अनुबंध के अभाव में बंधकी किश्तों द्वारा धन प्राप्त करने
को बाध्य नहीं है -
24 इलाहाबाद 461
(3) मूलधन देय होने से पूर्व भी ब्याज के लिए वाद चलने योग्य है, जब तक
कि उसको (बंधकी को) ऐसा करने से वर्जित करने की प्रसंविदा नहीं है।
(4) ये तीन अधिकार हर एक बंधकी को उपलब्ध नहीं हैं।
( i ) धन के लिए वाद लाने का अधिकार।
धारा 68
यह केवल वहां उपलब्ध है जहां बंधककर्त्ता स्वयं को उसे चुकाने के लिए आबद्ध करता है।
प्रश्न - यह कब कहा जा सकता है कि एक बंधककर्त्ता व्यक्तिगत तौर पर अदा करने को आबद्ध है?
इस विषय पर दो दृष्टिकोण हैं -
(अ) सभी प्रकार के बंधकों में वैयक्तिक प्रसंविदा मान ली जाती है। इस दृष्टिकोण
के अनुसार एकमात्र अंतर यह हो सकता है कि एक अभिव्यक्ति प्रसंविदा
के अभाव में न्यायालय अन्य वाद में अपेक्षा की तुलना में अधिक स्पष्टतः
विवक्षित प्रसंविदाओं की मांग कर सकता है।
13 लाह. 259
(ब) दूसरा दृष्टिकोण है कि प्रसंविदा तभी उद्भूत हो सकती है जहां एक स्पष्ट
प्रसंविदा है, शब्द स्वयं को आबद्ध करता है। यह अनावश्यक होगा यदि
वैयक्तिक प्रसंविदा सभी वादों में अंतर्निहित हो।
परिभाषा द्वारा
धारा 58