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गई है - संपादक।
(2) अवक्रमित दोषों के मामलों में प्रारंभिक बिन्दु। (3) निरंतर दोषों के मामलों में प्रारंभिक बिन्दु। (II) समय कब चलना प्रारंभ होता है इसके विरुद्ध?
वादी के विरुद्ध कब।
प्रतिवादी के विरुद्ध कब।
V. स्तंभ-2 से उद्भूत होने वाले प्रश्न
- समयावधि कैसे परिकलित की जाती है? (1) कलेंडर
(2) ऐसे मामले जिनमें समय अपवर्जित किया जाता है। (3) ऐसे मामले जिनमें लुप्त समय घटा दिया जाता है। II. क्या समय बढ़ाया जा सकता है?
III. क्या विलंब क्षमा किया जा सकता है?
IX. परिसीमा का अर्थान्वयन
साधारण सिद्धांत।
विनिर्दिष्ट और अवशिष्ट अनुच्छेद
भाग- IV स्तंभ I से उत्पन्न होने वाले प्रश्न
खंड -1 वाद
वर्ग - प्रथम - धन के लिए वाद - 57, 64, 85 व्याख्या - (1) वणि्र्त लेखा/खाता - 64
(2) अपने पास का एवं प्राप्त धन - 62
(3) परस्पर, खुला एवं प्रचलित/चालू खाता - 85 (4) जमा - 60
वर्ग - द्वितीय - परक्राम्य लिखतों पर वाद - 69, 80 व्याख्या - किश्तों में देय धन - 75