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I. परिसीमा पर भारतीय विधि

परिचायक

परिसीमा विधि की प्रकृति क्या है?

अनेक प्रकार से काल सीमा मुकदमे की प्रक्रिया में प्रवेश होता है।

(1) वे मामले जहां विधि में अभिव्यक्त हैं कि कार्यवाही एक कथित कालावधि

में ही की जाएगीः-

दृष्टांत - आदेश 6 नियम 18 - वाद पत्र का संशोधन। संशोधन करने की इजाजत पाने वाला पक्ष, न्यायालय द्वारा नियत समय के भीतर अवश्य संशोधन करे और यदि कोई समय नियत नहीं किया गया तब 14 दिन के भीतर।

(2) वे मामले जहां विधि में अभिव्यक्त है कि कार्यवाही एक निश्चित समय

व्यतीत होने से पूर्व नहीं की जाएगी।

दृष्टांत - धारा 80 सी प्र. सं. (सी.पी.सी.) - राज्य सचिव के विरुद्ध वाद। परिषद् भारत के लिए विदेश मंत्री या किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध कोई वाद ऐसे लोक अधिकारी द्वारा उसकी पदीय क्षमता में कृत माने जाने वाले किसी कार्य के संबंध में लिखित नोटिस (सूचना) देने के बाद दो माह व्यतीत हो जाने तक प्रस्तुत नहीं किया जाता।

(3) वे मामले जिनमें विधि निर्धारित करती है कि एक निश्चित समय के व्यतीत

हो चुकने के बाद कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

  1. यह मामलों का तृतीय वर्ग है जो सही अर्थों में परिसीमा विधि की विषय वस्तु है।

2. परिसीमा-विबंध उपमति एवं अतिविलंब में अंतर

ये सब एक व्यथित पक्ष को उसके साथ किए गए दोष के लिए उपचार से वंचित किए जाने का प्रभाव रखते हैं। ऐसा होने पर उनका परिसीमा से अंतर करना आवश्यक है।

परिसीमा एवं विबंध

  1. परिसीमा द्वारा कोई व्यक्ति निर्धारित समय के बाद वाद लाने के कारण

अनुतोष से रोका जा सकता है।

  1. विबंध द्वारा कोई व्यक्ति अनुतोष पाने में असफल हो जाता है क्योंकि वह