I. परिसीमा पर भारतीय विधि - Page 195

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

अपने वाद को सिद्ध करने हेतु साक्ष्य प्रस्तुत करने से विधि द्वारा रोका जाता

है।

परिसीमा और उपमति

  1. परिसीमा एक वादकारी को एक दोष के लिए अनुतोष प्राप्त करने के विषय

में विफल करती है क्योंकि वह दोषकरण की सम्मति दे चुका है क्योंकि

उसका वाद समयावधि के बाद का है।

  1. उपमति एक वादकारी को एक दोष के लिए अनुतोष प्राप्त करने के विषय

में विफल करती है क्योंकि वह दोषकरण की सम्मति दे चुका है।

परिसीमा एवं अतिविलंब

  1. दोनों में एक सामान्य लक्षण है - अनुतोष इस एकमात्र कारण पर मना किया जाता

है कि कार्यवाही समयावधि के अंतर्गत नहीं की गई है।

  1. इसमें अंतर है - परिसीमा में जिस समय के अंतर्गत वाद नहीं लाया जाएगा वह

विधि द्वारा निर्धारित है। अतिविलंब में कोई समय निर्धारित नहीं है और न्यायालय,

इसलिए अनुतोष देने के लिए अनुचित विलम्ब के सिद्धांत पर चलता है। 3. भारत में अतिविलंब के सिद्धांत की परिसीमा विधि के कारण अधिक व्याप्ति नहीं

है। जो लगभग सभी वादों के लिए एक निश्चित काल सीमा निर्धारित करती है।

अतः यह कोई बात नहीं कि कोई अपना वाद विधि द्वारा निर्धारित काल के प्रथम

दिन या अंतिम दिन लाता है।

  1. भारत में अतिविलंब का सिद्धांत केवल निम्न वादों में लागू होता हैः-

(1) जहां दिया जाने वाला अनुतोष स्वविवेकाधीन है। यह इस प्रकार है -

(i) विशिष्ट अनुतोष के अधीन आने वाले मामलों में।

(ii) वादकालीन अनुतोष के अधीन आने वाले मामलों में।

(2) जहां परिसीमा विधि लागू नहीं होती, अर्थात् वैवाहिक वाद। विलंब का अर्थ होगा कि अपराध क्षमा कर दिया गया था।

3. परिसीमा का उद्देश्य

  1. सुव्यवस्थित समाज/समुदाय के लिए दो बातें आवश्यक हैं -

(i) दोषों का अवश्य उपचार हो।

(ii) शांति अवश्य कायम रखी जाए।

  1. समाज की शांति को सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संपत्ति के हक एवं