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- धारा 55(2) हक के संबंध में दुर्व्यपदेशन या मिथ्या विवरण से संबंधित है। हक के मिथ्या विवरण और संपत्ति के मिथ्या विवरण के बीच एक प्रभेद अवश्य करना चाहिए।
(i) हक का मिथ्या विवरण धारा 55(2) के अधीन नुकसानी के प्रति अधिकार प्रदान करता है।
(ii) हक की प्रसंविदा का विस्तार संपत्ति के मिथ्या विवरण तक नहीं होता है अर्थात् बिक्रीत भूमि के विस्तार के संबंध में।
(iii) हक की प्रसंविदा ऐसी प्रसंविदा नहीं है कि अंतरित किए जाने हेतु तात्पर्यित भूमि विक्रय विलेख में वर्णित विस्तार की है। यह मात्र विक्रेता के हक की वैधता के क्रेता के साथ एक संविदा है। फलतः यदि क्रेता क्षेत्र में कोई कठिनाई पाता है तो उसका वाद हक की प्रसंविदा पर आधारित न हो वरन् मूल्य की आंशिक असफलता के लिए हो।
- हक के लिए अभिव्यक्त प्रसंविदा। हर एक हस्तांतरणकर्ता की हक के लिए विवक्षित प्रसंविदा होती है। किंतु पक्षों को हक से संबंधित एक स्पष्ट समझौता अवश्य करना चाहिए। एक अभिव्यक्त प्रसंविदा के संबंध में ध्यान में रखने वाले विचारबिंदु ये हैंः-
(अ) क्या वह सभी अंतर्निहित प्रसंविदाओं पर अध्यारोही है और उनके प्रभाव को नष्ट करती है।
(ब) यद्यपि एक अभिव्यक्त प्रसंविदा अकेली पक्षों के अधिकारों को शासित कर सकती है, तो भी विवक्षित प्रसंविदा से स्पष्ट एवं असंदिग्ध अभिव्यक्ति के सिवाए छुटकारा नहीं पाया जा सकता है।
प्रसंविदा के लाभों का दावा कौन कर सकता हैः हक के लिए प्रसंविदा लाभों का न केवल क्रेता एवं उसके प्रतिनिधिगण उपभोग कर सकते हैं वरन् पश्चात्वर्ती अन्य संक्रांती भी, जो क्रेता के अधीन इसे विक्रेता के विरुद्ध प्रवर्तित कर सकते हैं।
इस खंड के अधीन विक्रेता संपत्ति के अपने अनन्य हक की प्रत्याभूति करने वाला माना जाता है। यदि वह स्वयं अपने प्रसंविदा के बाहर संपर्क की इच्छा करता है तो ऐसा उसे स्पष्टतः आवश्यक या निहितार्थ अवश्य करना चाहिए।
विवक्षित प्रसंविदा हक के लिए प्रश्न के साथ कुछ नहीं करना है भले ही क्रेता को हक के दोष की सूचना है या नहीं है, और क्रेता के दोष का ज्ञान उसको नुकसानी के लिए वाद लाने के लिए अधिकार से वंचित नहीं करता है और क्रय धन की एक वापसी का दावा कर सकता है यदि वह हक दोष के कारण है।