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भाग - 4
आन्वयिक न्यास
(1) आन्वयिक न्यास की चौदह स्थितियां हैं जो न्यास अधिनियम में प्रमाणित की गई है।
- वे पांच शीर्षों में आती हैंः-
(1) अंतरणों से उद्भूत होने वाले आन्वयिक न्यास - धाराएं 81, 82, 84, 85
(2) एक व्यक्ति के विपरीत एक व्यक्ति द्वारा अनुचित लाभ लेने से उद्भूत होने
वाले आन्वयिक न्यास - धाराएं - 85, 88, 89, 90, 93
(3) कृत संविदा से उद्भूत होने वाले आन्वयिक न्यास - धाराएं 86, 91, 92
(4) आन्वयिक न्यास - धारा 87
(5) विगत न्यास से उद्भूत होने वाले न्यास - धारा 83
- संपत्ति का अंतरण या वसीयत
( i ) धारा 81
- कुछ मामलों में संपत्ति का अंतरण या वसीयत अंतरिणी या (वसीयतदार) पर
स्वामी या उसके प्रतिनिधि के पक्ष में एक न्यास की प्रकृति में दायित्व डालकर
करता है।
साधारणतः अंतरणकर्त्ता या वसीयतकार संपत्ति को पूर्णतः ऐसे किसी दायित्व के बिना लेगा।
- यह कब अभिनिर्धारित किया जा सकता है कि अंतरिती या वसीयतदार उसे एक दायित्व
के अधीन लेता है? वह उसको एक दायित्व के अधीन लेता है जब स्वामी का आशय
अंतरिती या वसीयतकार की संपत्ति के लाभदायी हित का व्ययन नहीं है। 3. आशय किस प्रकार अवधारित किया जाता है? मामले की परिस्थिति के प्रकाश
में। यह परिस्थितियां ही हैं जो स्वामी के आशय को जान लेने के लिए अवश्य
ढूंढी जानी चाहिए।
(ii) धारा 82
- दूसरा मामला जहां संपत्ति अंतरण, अंतरिती पर न्यास की प्रकृति के एक दायित्व
का आरोपण करता है, ऐसा मामला है जहां एक व्यक्ति को अंतरिती बनाया जाता
है और दूसरे व्यक्ति द्वारा मूल्य चुकाया जाता है - ऐसे एक मामले में अंतरिती
उसे न्यास में रखते है। उस व्यक्ति के लिए जिसने मूल्य चुकाया था।
साधारणतः अंतरिती विधिक दृष्टि से स्वामी होगा, अंतरक उसको द्वारा संपत्ति अंतरित किए जाने पर।
- यह नियम की अंतरिती जिसने मूल्य अदा नहीं किया है, उसे उस व्यक्ति के लिए