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भाग V
आन्वयिक न्यास का प्रशासन
भारतीय न्यास अधिनियम
- न्यास से संबंधित विधि 1882 के अधिनियम - 11 में समाविष्ट है।
- यह ऐसा अधिनियम है जो परिभाषित और संशोधित करता है - जिसका अर्थ है
कि यह कोई नया सिद्धांत नहीं करता है।
- अधिनियम विधि को समेकित नहीं करता है - जिसका अर्थ है कि यह सर्वांगपूर्ण
संहिता नहीं है।
- अधिनियमित का उद्देश्य न्यासों के संबंधित विधिक प्रावधानों को अधिनियमित कर
एक समूह में रखना था। 1882 के अधिनियम से पूर्व न्यास से संविधिक विधि,
29 सी.ए.आर. (कार) 11 सी.-31 धाराएं 7-11 में समाविष्ट थीं।
1886 का अधिनियम - XXVII
1866 का अधिनियम - XXVIII
दंड संहिता विनिर्दिष्ट अनुतोष सिविल प्रक्रिया संहिता, स्टाम्प अधिनियम परिसीमा, राजकीय प्रतिभूतियों का अधिनियम, कंपनी अधिनियम, प्रेसीडेंसी बैंक अधिनियम में यत्र-तत्र बिखरे हुए कुछ एकाकी प्रावधान भी थे।
- जैसा कि मूल रूप से प्रतिपादित किया गया था अधिनियम समग्र ब्रिटिश भारत
पर लागू नहीं था। उदाहरण के लिए वह बंबई में लागू नहीं होता था, किंतु यह
प्रावधान स्थानीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा इसका विस्तार करने के लिए किया
गया था।
- यहां यह विवेचना करना अनावश्यक है कि क्या हिंदू विधि एवं मुस्लिम विधि
न्यास को जैसा कि वह न्यास अधिनियम में परिभाषित है, मान्यता प्रदान करती
थी। इस पर अन्य लोगों द्वारा विचार किया जा सकता है।
न्यास की प्रकृति
- न्यास धारा 3 में परिभाषित है। न्यास में तीन बातें होती हैंः-
(1) एक व्यक्ति जो किसी संपत्ति का स्वामी है।
(2) स्वामित्व एक बाध्यता के साथ भारित।
(3) संपत्ति का अन्य व्यक्तियों या अन्य एवं स्वयं के लाभ के लिए उपयोग करने
की बाध्यता।