282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
सकता है।
प्रश्न हैः क्या ऐसे वादों में न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन प्रदान करने के लिए आबद्ध है?
इस प्रश्न का उत्तर धारा 22 में अंकित है।
(अ) धारा 22 सामान्य नियम निर्धारित करती है।
(1) यह कहती है कि विनिर्दिष्ट पालन विवेकाधीन है। न्यायालय इसको दे सकता है या देने से इंकार कर सकता है। न्यायालय इसे प्रदान करने को मात्र इसलिए बाध्य नहीं है कि यह विधिपूर्ण है।
(2) न्यायालय का विवेक अमनमाना ठोस और युक्तियुक्त तथा न्यायिक सिद्धांतों से मार्गदर्शित होता है।
(ब) धारा 22 वादों को विनिर्दिष्ट करती है जिनमें न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन मंजूर न करने के लिए और वादों को विनिर्दिष्ट करती है जिनमें न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन मंजूर करने के लिए विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है।
वे वाद जिनमें न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन मंजूर न करने के लिए
विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है
(i) जहां विनिर्दिष्ट पालन प्रतिवादी के ऊपर अनुचित लाभ देगा।
(ii) जहां विनिर्दिष्ट पालन के प्रतिवादी को किसी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा जिसे पहले नहीं देखा था और अनुपालन से वादी को ऐसी कठिनाई भोगनी होगी।
वे वाद जिनमें न्यायालय विनिर्दिष्ट अनुपालन मंजूर करने के लिए
विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है
जहां वादी ने विनिर्दिष्ट पालन योग्य संविदा के परिणामस्वरूप सारवान कार्य किए हैं या नुकसान उठाए हैं।
नुकसानी एवं विनिर्दिष्ट पालन
धारा 19, 20, 29
उल्लंघन के लिए दो उपचारः क्या वे परस्पर अपवर्जक हैं या क्या वे पूरक हैं? क्या एक-दूसरे को वर्जित करता है।
ये प्रश्न हैं जिन पर धारा 19, 20, 29 में विचार किया गया है। इन तीनों धाराओं में अंतर्विष्ट नियमों का सारांश निम्न प्रकार दिया जा सकता हैः-
19.(1) एक ही वाद में वादी दोनों अभिवृद्धि में या प्रतिस्थापन में दोनों मांग कर सकता है।