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का अनुसरण किया और उस समाज का एक अंग बन गया जिसका यह दूसरों के साथ सदस्य हो गया।
मनुष्य का और मनुष्य के द्वारा बने संगठन द्वारा मनुष्य शासनतंत्र संस्था में इतना सामाजिक था कि वह विलग न हो सका।
यद्यपि रोम के प्रारंभिक दिनों में केवल वे ही स्वयं को रोमन नागरिक कह सकते थे जो स्वतंत्र जन्मे थे और रोम में जन्मे थे। तो भी उसके बाद बहुत शीघ्र ही विधायी ने संस्था को प्राधिकार से विदेशियों को नागरिकता दे दी गई। बाद में जैसे-जैसे रोम अपने पड़ोसी देशों पर विजय करते हुए आगे बढ़ा तो विधायी प्राधिकारियों ने उन राज्यों को आदेश पत्र जारी किए जिनके द्वारा ऐसे राज्यों के नागरिक रोमन नागरिकता में ले लिए गए और उनकी पूर्व नागरिकता समाप्त कर दी गई।
सिसरो ने नियम बनाया कि फ्हर मनुष्य एक समाज की सदस्यता के अपने अधिकारों को रखने या त्याग करने के योग्य अवश्य हो।य् और आगे कहा कि यह स्वतंत्रता की दृढ़तम आधारशिला है। फ्इसके अंतर्गत रोमनों ने जिस सभा को अपनाया और किसी को अपने साथ रहने को बाध्य नहीं किया।
रोमन विधि का यह दृष्टिकोण नैसर्गिक विधि पर आधारित था।
आक्रमण का प्रभाव
रोम के पतन के बाद नैसर्गिक विधि के इस सिद्धांत का स्थान आक्रामकों द्वारा चालू किए गए सामंतवादी सिद्धांतों ने ले लिया।
आक्रामकों ने लोगों और उनकी भूमियों दोनों को जीतते हुए एक राजा जो प्रजा सर्व शक्तिमान था के रूप में अपनी सरकार संगठित की। संबंध, जैसे मनुष्य एवं मनुष्य के बीच और उसका संबंध शासन के प्रति अनैच्छिक और बलात् था। मनुष्य के नैसर्गिक अधिकार जैसे मनुष्य के होते हैं अस्वीकृत कर दिए गए थे।
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- विनिर्दिष्ट अनुतोष विधि
(प्रारंभिक अंश अप्राप्य - संपादक)
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प्रकृति जिसका विनिर्दिष्ट पालन विधि द्वारा अनुज्ञात है।
(ii) जहां वादी एक व्यक्ति है जिसके पक्ष में विनिर्दिष्ट पालन प्रदान किया जा सकता है।
(iii) जहां प्रतिवादी एक व्यक्ति है जिसके विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन प्रदान किया जा