अधिनियम द्वारा मान्य - Page 320

303

(i) जो उसके अतिक्रमण के लिए प्रतिकार वसूल नहीं कर सका।

(ii) जो संविदा का निपालन करने में अक्षम हो गया है या (उसकी) किसी अनिवार्य शर्त को भंग करता है।

(iii) जो पहले ही अपने उपचार को चुन चुका है और अभिकथित भंग के लिए मनस्तोप प्राप्त कर चुका है।

(iv) जिसको संविदा से पूर्व सूचनार्थ थी कि एक व्यवस्था की गई और प्रवर्तित थी।

यह धारा, धारा 23 से इस बात में भेदनीय है कि विनिर्दिष्ट पालन का बचाव स्वतः संविदा में किसी बात पर आधारित नहीं है वरन् केवल वादी के कार्यों एवं आचरण पर पूर्णतः आधारित है।

धारा 24 एक सामान्य धारा है। जबकि धारा 25 एक धारा है जो विशेष है और यह प्रवर्तन में मात्र दो प्रकार की चल या स्थावर संविदाओं तक सीमित है - (i) विक्रय के लिए संविदा और (ii) संपत्ति को किराए पर देने की संविदा।

धारा 25 व्यक्त करती है कि इस प्रकार संविदा विक्रेता या पट्टठ्ठेदार के पक्ष में विशिष्टतः प्रवर्तित नहीं हो सकती है, अर्थात् निम्नलिखित स्थितियांः

(i) संपत्ति में कोई हक न होने के विषय में जानते हुए उसको बेचने या किराए पर देने के लिए संविदा कर चुका है।

(ii) जो न्यायालय या पक्षों द्वारा नियम दिनांक पर यथोचित संदेह से मुक्त हक नहीं दे सकता है।

(iii) जो संविदा करने से पूर्व संविदा की विषय-वस्तु की व्यवस्था कर चुका था।

धारा 3 में व्यवस्थापन परिभाषित है और अभिप्रायः है कि कोई विलेख जिसके द्वारा लक्ष्य या न्यागमन चल और स्थावर संपत्ति में उत्तरवर्ती हितों का व्ययन किया जाता है या व्ययन करने की सहमति दी जाती है।

III. व्यक्ति जिनके विरुद्ध संविदा प्रवर्तित कराई जा सकती है।

(i) धारा 27 दोनों में से कोई पक्ष।

(ii) संविदा के पश्चात्वर्ती उद्भूत हक के द्वारा एक पक्ष के अधीन दावा करने वाला कोई अन्य व्यक्ति बिना सूचना के मूल्य के लिए हितों के सिवाए।

(iii) किसी हक के अधीन जो संविदा के पूर्व शून्यकरणीय था और वादी को ज्ञात था और प्रतिवादी द्वारा विस्थापित था के अधीन दावा करने वाला कोई व्यक्ति।

(iv) आमेलन के बाद नई कंपनी।

(v) संप्रवर्तकों द्वारा की गई संविदा के संबंध में कंपनी।