328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
में ब संपत्ति को स के नाम बंधक करता है, जिसको अ के दावे की सूचना नहीं है। अ एवं स के बीच यद्यपि अ का साम्यिक अधिकार स के (साम्यिक अधिकार) का पूर्ववर्ती है तो भी साम्याएं असमान हैं। अ उपेक्षा का दोषी है, इसलिए स को साम्या श्रेष्ठतर है और प्रवृत्त होगी हालांकि वह समयानुसार बाद की है।
- कुछ मामलों में दो साम्यिक हितों में टकराव उन अलग-अलग समयों का जिन पर हित अंतरित किया गया था, प्राथमिकता के विषय में विवाद होता है। अन्य मामलों में यह उन अलग-अलग समयों से जिन पर लिखित सूचना अंतरित हित (सही व्यक्ति या व्यक्तियों को दी जाती है, निर्धारित की जाती है) (उदाहरणार्थ, व्यवहार्य वस्तु के समनुदेशन के मामले में)
समाहारः- साम्या की तीन सूक्तियां हैंः-
(1) जहां साम्याएं समान होती हैं वहां विधि अविभावी होती है।
(2) जहां साम्याएं समान होती हैं वहां समय में प्रथम अविभावी होती है।
(3) जहां साम्याएं असमान होती हैं वहां श्रेष्ठतर साम्या अविभावी होती है।
स्पष्टीकरणः-
प्रथम प्रतिपादना में उन मामलों का हवाला है जिनमें साम्यिक अधिकार और विधिक अधिकार के बीच टकराव है और मामलों के दोनों वर्गों पर लागू होता है। (1) जहां साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार से पूर्ववर्ती होता है। साथ ही (2) जहां साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार से पश्चात्वर्ती होता है।
विधि अविभावी होती है का अर्थ है कि जहां असाम्या विधिक अधिकार से स्वामी पर आरोपित नहीं की जा सकती वहां विधिक अधिकार असाम्यिक अधिकार पर अविभावी रहता है - जैसे कि नोटिस (सूचना) या कपट।
प्रतिपादना दो एवं तीन उन मामलों का हवाला है जहां दो साम्यिक अधिकारों में टकराव होता है।
साम्यिक समनुदेशन
(i) सामान्य
यद्यपि यह विषय साम्यिक समनुदेशन कहलाता है, फिर भी यह संक्षेप शब्द है। एक विषय है व्यवहार्य वस्तु का साम्यिक समनुदेशन।
आरंभिक स्वरूप के तीन विषय है, जिन पर प्रारंभ में ही विचार किया जाना चाहिएः-
(1) समनुदेशन क्या है?
(2) व्यवहार्य वस्तु क्या है?