368 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
अपवाद है। वह है कि एक अभियुक्त व्यक्ति एक दंड-वाद में जिसमें वह अनुवीक्षित किया जा रहा है, को साक्षी के रूप में परीक्षित नहीं किया जा सकता है।
शारीरिक बीमारी का एक मामला है जो समझदारी के दिमाग को प्रभावित नहीं करती है। मूकता ऐसी ही एक बीमारी है।
धारा 119 ऐसे ही एक साक्षी के विषय में बतलाती है। धारा उसका असक्षम होना घोषित नहीं करती है। दूसरी ओर वह उसको एक सक्षम के रूप में मानती है, और उसको खुले न्यायालय में किसी भी ढंग से लिखित रूप में या संकेतों द्वारा साक्ष्य देने की अनुमति देती है।
साक्षी की सत्यवादिता के दृष्टिकोण से सक्षमता
अभिप्रेरक, जो सत्य बोलने से एक व्यक्ति को रोकते हैं, जीवन के साधारण कार्यों की तुलना में न्यायिक कार्यवाहियों में अधिक हैं, इस तथ्य के कारण कि न्यायिक कार्यवाही के परिणाम की आज्ञा नहीं की जा सकती है और एक पंच की अनौपचारिक कार्यवाहियों से कहीं अधिक एक ढंग में बाध्यकारी हैं। फलतः विधि एक मामले में एक समय पर बहुत से लोगों को बौद्धिकतः सक्षम, असक्षम कर देगी।
पूर्वतः अतः, असक्षमता के लिए न केवल मानसिक अक्षमता एक अच्छा आधार थी वरन् हित भी असक्षमता का एक आधार था। कारण था कि एक हितधारी व्यक्ति सच नहीं बोलेगा। फलस्वरूप एक समय, निम्नोक्त व्यक्ति असक्षम समझे जाते थे।
मुकदमे के पक्षकार।
एक दूसरे के विरुद्ध पति एवं पत्नी।
स्वयं के विरुद्ध अभियुक्त।
एक सह अपराधी।
विधि का यह दृष्टिकोण अब प्रवर्तित है और सिद्धांत परिवर्तित हो गया है। सक्षमता या असक्षमता का प्रश्न, विश्वसनीयता या अविश्वसनीयता में परिवर्तित हो चुका है। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए सक्षम बना दिया गया है, किंतु उसका विश्वास करना या अविश्वास करना यह न्यायालय पर छोड़ दिया गया है।
यह नया सिद्धांत धारा 120 और 133 में समाहित कर दिया गया है।
धारा 120
I. सिविल कार्यवाहियां
(i) मुकदमे में पक्षकार सक्षम साक्षी हैं।
(ii) मुकदमे के कि भी पक्ष के पति एवं पत्नी सक्षम साक्षी हैं।