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(iii) प्रमाणित करने में असफल होना और इसलिए अप्रमाणित।
- प्रमाण के भार का उन्मोचन किया जाता है जबः
(i) जब तथ्य का सिद्ध हो जाना अपेक्षित है, सिद्ध हो जाता है।
(ii) जब तथ्य का असिद्ध हो जाना अपेक्षित है, सिद्ध हो जाता है।
प्रमाण का भार उन्मोचित नहीं किया जाता जब पक्ष जिस पर प्रमाण का भार है, प्रमाणित या अप्रमाणित जैसा भी मामला है करने में असफल हो जाता है।
कब एक तथ्य का प्रमाणित या अप्रमाणित होना कहा जा सकता है? और कब उसका न प्रमाणित होना कहा जा सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर धारा 3 में दिया गया है।
टिप्पणी - दो बातें अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए -
( i ) प्रमाण का अभिप्राय कठोर गणितीय प्रमाणन नहीं है।
( ii ) नैतिक दृढ़ धारण प्रमाण नहीं है।
प्रमाण का अभिप्राय है साक्ष्यः-
किंतु ऐसा साक्ष्य है जैसा किसी परिणाम पर पहुंचने के लिए कोई विवेकशील पुरुष देगा।
(1911) 1. के.बी. 988 (995) (31 बंबई एल.आर. 516)
प्रमाण का प्रश्न संभाव्यता का एक प्रश्न है, निश्चितता का नहीं।
प्रमाण के भार का उन्मोचन और साक्ष्य की प्रमात्रा
- आंग्ल विधि के अंतर्गत कुछ मामलों में संपोषण आवश्यक हैः
(1) घोर राजद्रोह - दो साक्षी।
(2) कूट साक्ष्य
(3) प्रतिज्ञा-भंग
(4) दोगला (जारंज) - मां का साक्ष्य अवश्य संपोषित होना चाहिए।
भारतीय विधि के अंतर्गत नियम एकांतिक है। न्यायालय एक ही साक्षी के साक्ष्य, चाहे वह समर्थन में न हों, पर कार्यवाही कर सकता है।
अपवाद......
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