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सिविल प्रक्रिया संहिता दंड प्रक्रिया संहिता
डिक्री या अंतिम आदेश को करने वाले न्यायालय के आदेश की पुष्टि करता है, अपील विधि के सारभूत प्रश्न को समाहित करता है।
धारा 111
धारा 109 में धारित किसी विषय के होते हुए भी परिषद में महामहिम को कोई अपील स्वीकार्य नहीं होगी -
(अ) अधिकार लेख से महामहिम द्वारा संघटित एक उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की डिक्री या अंतिम आदेश से या एक प्रभागीय न्यायालय के एक न्यायाधीश या ऐसे उच्च न्यायालय के दो या अधिक न्यायाधीश के या एक ऐसे उच्च न्यायालय के विधायी न्यायालय के न्यायाधीश या उपरोक्त दो अधिक न्यायाधीशों के अंतिम आदेश या डिक्री से, जहां ऐसे न्यायाधीश विचारों में समानतः बंटे हैं और तत्समय पर उच्च न्यायालय के समग्र न्यायाधीशों की संख्या समान नहीं होती।
(ब) किसी डिक्री से, जिससे धारा 102 के अधीन कोई द्वितीय अपील स्वीकार्य नहीं है।
धारा 111 (अ)
जहां भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 205 (1) के अधीन एक प्रमाणपत्र दिया गया है, अंतिम तीन पूर्वगत धाराएं संघीय न्यायालय की अपीलों के संबंध में प्रयुक्त की जाती हैं और तदनुसार महामहिम के लिए संदर्भ के रूप में अभिप्रायित की जाएगी।
उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करने के दृष्टिकोण के साथ कार्यवाही करेगी। (4) इस संबंध में परिषद में महामहिम द्वारा जैसी समय-समय पर बनाई जा सकती है, के अधीन एक ऐसी शर्त, जैसी कि उच्च न्यायालय स्थापित या अपेक्षा कर सकता है, परिषद में एक अपील महामहिम को स्वीकार्य होगी, किसी उपधारा (1) के अधीन एक विभागीय न्यायालय द्वारा अपील पर किया गया कोई आदेश जिसके संबंध में उच्च न्यायालय घोषित करता है कि विषय ऐसी अपील के लिए उपयुक्त है।
धारा 412 इससे पूर्व धारित किसी विषय के होते हुए भी जहां एक अभियुक्त व्यक्ति दोषी माना जा चुका है और एक उच्च न्यायालय के द्वारा अभिशंसित किया जा चुका है, सत्र न्यायालय या कोई प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट ऐसे तर्क पर कोई अपील दंडादेश की सीमा या विधिकतः अतिरिक्त स्वीकार्य नहीं होगी।
धारा 413 इससे पूर्व धारित किसी बात के होते हुए भी एक अभिशस्त व्यक्ति द्वारा ऐसे वादों, जिनमें एक उच्च न्यायालय मात्र छह माह से अधिक कारावास या कम से कम 200/- रुपए केंदडादेश या एक सत्र न्यायालय कम से कम एक माह से अधिक दंडादेश पारित करता है, या जिसमें एक सत्र न्यायालय या जिला मजिस्ट्रेट