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शासपत्र और दिवालिया अधिनियम
ऐसे मामले जिनमें पक्ष सिद्ध करने से विबंधित हैः
विबंधन की विधि धारा 115, 116 एवं 117 में अन्तर्विष्ट है। धारा 115 विबंधन के सामान्य नियमों का विवरण करती है। धारा 116 एवं 117 विशेष प्रकार के विबंधनों को अधिनियमित करती हैं।
2. धारा 115
(1) धारा 115 की धारा 31 के साथ तुलना।
विबंधन एक स्वीकृति के समान है जितना कि यह एक तथ्य की एक अभिव्यक्ति है। सर्वाधिक स्वीकृतियां उस पक्ष द्वारा, जो उनको करती है, वापस ली जा सकती हैं। तथ्य, जो उन्होंने व्यक्त किया, बना रहता है, किन्तु उस पक्ष को जिसने उनको व्यक्त किया था उसका स्पष्टीकरण करते हुए सुना जा सकता है कि उसने उसे अतिशीघ्रता में एवं असावधानीपूर्ण और गलत आशंका के अधीन व्यक्त किया था। यहां तक कि उसे कहते हुए भी सुना जा सकता था कि वह जानता था जो उसने कहा असत्य है। किन्तु एक कथन एक व्यक्ति द्वारा एक अन्य व्यक्ति के प्रति एक ऐसे सुस्पष्ट ढंग एवं ऐसी परिस्थितियों में किया जा सकता है कि उसका दूसरे पर निश्चयात्मक प्रभाव होता है। विधि एक व्यक्ति को, ऐसे एक कथन का खंडन करने के लिए अनुमति नहीं देगी। एक विबंधन और एक स्वीकरण में बहुत कम अंतर है और इस प्रश्न, कि क्या एक कथन मात्र एक स्वीकरण है या एक विबंधन है, का उत्तर कथन की स्वाभाविकता और उससे सम्बन्धित परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
(2) विबंधन के नियम की विधिक अपेक्षाएं क्या हैं?
विबंधन का नियम प्रवर्तन में आता है जब निम्नोक्त तीन शर्तें सन्तुष्ट हो जाती हैं।
37 बम्बई एल.आर. 544 पी.सी.
(i) प्रतिवादी के द्वारा, एक तथ्य के अस्तित्व का निरूपण करने वाला एक कथन या
उसके अधिकृत एजेन्ट द्वारा वादी या उसके पक्ष में किसी व्यक्ति के प्रतिः
(ii) इस अभीच्छा से कि कथन के विश्वास पर वादी को कार्य करना चाहिए_
और
(iii) वादी कथन के विश्वास पर कार्य करता है।
कथन निरूपण के समान ही होना चाहिए।
निरूपण शब्द या आचरण द्वारा हो सकता है।
अ. यदि यह शब्दों द्वारा है तो उनकी असत्यता के ज्ञान के साथ जानबूझ कर किया गया एक सक्रिय दुर्निरूपण हो सकता है।
दृष्टांतः-
मैककेंस बनाम लंदन और नार्दर पश्चिम रेलवे कं.