पुनरीक्षण अधिकारिता - Page 89

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

जब पक्ष का सामान्य चरित्र विवाद्यक नहीं है, चरित्र का प्रमाण विधि द्वारा अनुज्ञात नहीं किया जाता। धारा 52

इस नियम के दो अपवाद हैं, जिनके अंतर्गत चरित्र का साक्ष्य अनुमत किया जाता है, हालांकि चरित्र विवाद्यक नहीं है।

(i) सिविल कार्यवाहियों में, चरित्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाण अनुमत किया जाता है यदि वे क्षति के भाग को प्रभावित करते हैं। धारा 55

(ii) फौजदारी के मामलों में।

(i) अभियुक्त के सद्चरित्र को दर्शाने वाले तथ्यों का प्रमाण हमेशा अनुमत किया जाता है। धारा 53

(ii) अभियुक्त के दुश्चरित्र को दर्शाने वाले तथ्यों का प्रमाण अनुमत नहीं किया जाता है, निम्नलिखित मामलों के अतिरिक्त जहां अभियुक्त ने साक्ष्य दिया है कि वह सच्चरित्र है।

कारण है, क्योंकि सिविल एवं दंड कार्यवाहियों में यह अन्तर स्पष्ट है।

(1) दुश्चरित्र अभियुक्त के विरुद्ध केवल पूर्व धारणा बनती है। यह अभियुक्त

के विरुद्ध विषय को प्रमाणित नहीं करती है। यह असंगत है जब तक कि

अभियुक्त इसे एक विवाद्यक विषय नहीं बनाता है, अपने सद्चरित्र का साक्ष्य

देने के द्वारा, तब निस्संदेह दुष्चरित्र का साक्ष्य दिया जा सकता है।

(2) सद्चरित्र, अभियुक्त की निर्दोषिता को सुदृढ़ करता है और मानवीय आधार

पर अनुमत किया जाना चाहिए।

दो बातें ध्यान देने की हैं।

1. चरित्र शब्द में क्या सम्मिलित है?

धारा 55

चरित्र शब्द ख्याति और मनोवृत्ति दोनों को सम्मिलित करता है। यह आंग्ल विधि से पृथक है, जिसमें केवल चरित्र ख्याति तक सीमित है।

ख्याति और स्वभाव में एक प्रभेद है। ख्याति का अभिप्राय है एक व्यक्ति के विषय में दूसरों के द्वारा जो सोचा जाता है और वह लोकमत से बनी होती है। वह सामान्य शाखा है जिसे एक व्यक्ति उस मत से प्राप्त करता है।

मनोवृत्ति कार्य के स्रोतों एवं प्रेरकों को सम्मिलित करती है, जो व्यवस्थित एवं स्थायी होती है और मस्तिष्क की सम्पूर्ण मनोदशा एवं स्वभाव से संबंध रखती है।

2. चरित्र को कैसे प्रमाणित किया जाए?

एक व्यक्ति के चरित्र को प्रमाणित करन के दो उपाय हैं। एक उपाय है सामान्य

ख्याति और सामान्य स्वभाव का साक्ष्य देना। दूसरा उपाय है विशेष कार्य, जो ख्याति एवं स्वभाव के अनुमान के आधार हो सकते हैं, का साक्ष्य देना।