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55 व्याख्या -
साक्ष्य अधिनियम केवल सामान्य ख्याति और सामान्य मनोवृत्ति का साक्ष्य देना अनुज्ञात करता है।
55 व्याख्या -
केवल एक अपवाद है जिसके अंतर्गत दुश्चरित्र के साक्ष्य के बारे में पहले का अपराध जो सिद्ध हो चुका है के बारे में साक्ष्य दिया जा सकता है।
धारा 45-51
मतों का प्रमाण
- न्यायालय को मामले के तथ्यों के बारे में सूचना देना साक्षियों का उपयोग
है। स्वयं अपना अभिमत बनाना यह न्यायालय का कर्त्तव्य है।
- जो साक्षी ने सोचा या विश्वास किया वह दिखाना दो आधारों से आपत्तिजनक
होगा, (1) वह कुछ भी नहीं दिखा सकता है और (2) वह न्यायाधीश के
कार्यक्षेत्र की घेराबन्दी होगी।
- नियम है कि साक्षी अभिमतों को नहीं, तथ्यों को बताए। एक कठोर प्रयुक्ति
दो कठिनाइयां उत्पन्न करेगी।
(1) एक तीसरा व्यक्ति (अर्थात् कोई व्यक्ति जो न तो वादी है, न प्रतिवादी है और न एक बन्दी है) किसी प्रश्नगत विषय के बारे में क्या सोचता या विश्वास करता है, सारभूत नहीं है। यदि ऐसा तीसरा व्यक्ति साक्षी के रूप में बुलाया जाता है, उसको नियमानुसार, केवल तथ्यों को व्यक्त करना चाहिए, उसका वैयक्तिक मत साक्ष्य नहीं है। किन्तु एक पक्ष जो सोचता या विश्वास करता है उस समय वह सारभूत कार्य करता है, वह दण्ड एवं सिविल कार्यवाहियों दोनों में प्रायः एक विवाद्यक विषय है।
दृष्टांतः- कार्टर बनाम बोइहिन कॉकल पृ.
प्रश्न था, क्या एक बीमा पॉलिसी को उन तथ्यों के छुपाने के आधार पर रद्द कर दिया गया था, जो अधो लेखकों को बताए नहीं गए थे। एक दलाल ने तथ्यों की सारभूतता का साक्ष्य दिया। उससे पूछा गया क्या वह यह संविदा करता यदि ये तथ्य प्रत्यक्ष कर दिए जाते। उसका उत्तर कि वह नहीं करता, अस्वीकार्य किया गया था, चूंकि वह अभिमत का विषय था। किन्तु यदि वह प्रश्न पक्ष से पूछा गया होता तब उसका अभिमत मान्य हुआ होता।
(2) इस नियम की कठोर प्रयुक्ति अवश्य ही कठिनाइयां उत्पन्न करती है। उन वादों में जहां न्यायालय से एक अभिमत बनाने की अपेक्षा की जाती है, न्यायालय एक अभिमत बनाने के लिए सक्षम नहीं हो सकता। न्यायालय को एक सत्य अभिमत बनाने से पूर्व विशेष अनुभव या विशेष अभ्यास आवश्यक है। ऐसे मामले में उन लोगों की राय या मत जिन्हें विशेष अनुभव या विशेष प्रशिक्षण हैं को कोई भी सही निर्णय से